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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



गज़ल -
"निकली है आज छूने लो आसमान चिड़िया !"


अशोक अंजुम


निकली है आज छूने लो आसमान चिड़िया !
भर लेगी मुट्ठियों में सारा ज़हान चिड़िया !

हर मोड़ पर शिकारी, हर सिम्त हैं शिकारी 
गोया ज़रा सँभलकर भरना उड़ान चिड़िया !

कितना भी उड़ो ऊँचा, फैलाओ पंख जितने 
ऊँचाइयों पे रखना धरती का ध्यान चिड़िया !

हो घोंसले  में चाहे निकले किसी सफ़र पे,
देती है रोज़ कितने ही इम्तिहान चिड़िया !

बाज़ार  डालता  है  दाने  तरह - तरह  के 
रहना कदम - कदम पे तू सावधान चिड़िया !

नॉचे हैं पंख किसने हर ओर सनसनी है,
जो होश में आये तो खोले ज़ुबान चिड़िया ! 
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