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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



कहाँ आगाज होना था, कहाँ अंजाम होना था

डॉ० अनिल चड्डा

कहाँ आगाज होना था, कहाँ अंजाम होना था,
नहीं मालूम किसी को कैसे  काम होना था ।

वो नजरें चुराते रहे हमसे हमेशा सदा,
ऐसे में कबूल कहाँ हमारा सलाम होना था ।

सोते रहे उनके ख्वाबों की खातिर सदा,
दीदार उनका न सुबह, न शाम होना था ।

गवाँ दी जवानी उनकी याद में हमने,
बुढापा भी अब उनके नाम होना था ।

‘अनिल’ को नहीं अफ़सोस उनकी बेवफाई का,
वफ़ा को हमारी यूँही बदनाम होना था । 
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