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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



गुजरा जमाना याद करना गुनाह हो गया

डॉ० अनिल चड्डा

गुजरा जमाना याद करना गुनाह हो गया,
मुड़ कर देखने वाला तो तबाह हो गया ।

यूँ न छुपेगा खून प्यार में करना,
कत्ल करने वाला खुद गवाह हो गया ।

जो जलाते रहे दिल दूसरों का सदा,
आशियाँ उनका खुद ही स्वाह हो गया ।

उजले चेहरों ने इतने हैं जुर्म किये,
 चेहरा उनका हद से स्याह हो गया । 
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