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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



ग़र बात होती तो मन की कह लेते

डॉ० अनिल चड्डा

ग़र बात होती तो मन की कह लेते, 
वो न सुनते तो चुप ही रह लेते । 

माँगा तो था उनका हाथ डूबते हुए, 
बेहतर होता ग़र यूं ही बह लेते । 

मेरे आँसुओं से उनका वास्ता न था, 
वो चाहते हैं हम यूँ ही सह लेते । 

दिल  उनका अटका हमीं में ही था, 
वर्ना हमसे क्यों यूँ  पंगा वह लेते । 

‘अनिल’ की जुबाँ ग़र न खामोश रहती, 
जुल्म करने की हमपे न वो शह लेते ।
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