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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



दोहे

डॉ० अनिल चड्डा


नश्वर जग में हैं सभी, मिटता सब संसार,
वर्तमान खोना नहीं, बीता दियो बिसार ।

प्रभु ने जितना है दिया, उससे कर संतोष,
प्रभु के न्याय में कभी, पायेगा ना दोष ।

बेशक ही मुँह फेर लें, दुःख में सारे लोग,
अपने  को तू स्वार्थ का, लगने दियो न रोग ।

रिश्तों की खातिर मरे, ऐसा जग में कौन,
अपने पर आने लगे, हो सब कुछ ही गौण ।

जीवन उसने ही दिया, है शेष सभी प्रपंच,
उसने थामी डोर है, ज़माना है रंगमंच ।
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