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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 89,जुलाई(द्वितीय), 2020

आवाज की आत्म कथा

शिबू टूडू

एक रात की बात है। लेखक अपने कमरे में सो रहा था। आधी रात को उनके कानों में अचानक एक आवाज टकराती है। आवाज इतनी धीमी थी कि लेखक के लिए ठीक से सुन पाना मुश्किल हो रहा था। आवाज कट-कट कर आ रही थी। लेखक ने अनजान डरावनी आवाज को सुनने के लिए अपना सिर तकिए से थोड़ा ऊपर उठा लिया। आवाज तब भी ठीक से नहीं सुनाई दे रही थी। आवाज कटने लगी थी। लेखक ने अपना सिर तकिए में पुन: रखना चाहा, तभी एक जोरदार आवाज उसके कानों से टकराती है- "खबरदार तकिए में सिर रखा तो, तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ ? " लेखक ने डरे सहमे फिर से अपने सिर को तकिए से थोड़ा ऊपर उठाया और पूर्वी हवा के साथ कट-कट कर आ रही आवाज को सुनने का पुन: प्रयत्न किया।

मगर

आवाज फिर से हवा के साथ सिमटने लगी। लेखक नींद से ऊँघते हुए, फिर से सोने के लिए प्रयत्न करने लगा, तकिए में सिर रखना चाहा,फिर तभी पहले से भी तेज आवाज सुनाई देने लगी- "खबरदार तकिए में सिर रखा तो, शायद तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ, अब ध्यान से मेरी बात सुन,जा दुनिया में जा जाकर लोगों को समझा दे कि मैं कितना खतरनाक हूँ। एक समय थी कि लोग वीरप्पन से डरते थे, दुनिया के महाशक्ति ओसामा को अपना आतंक का पर्याय मानते थे, परन्तु, मैं उससे भी ज्यादा खतरनाक हूँ, जाओ दुनिया वालों को मेरे बारे में बताओ।" इतना कहते-कहते आवाज फिर कट-कट कर आने लगी, तब लेखक ने सोचा अब शायद खतरा टल गया है,वे अपने उठे हुए सिर को फिर से तकिए में रखने लगे तभी एक और तेज आवाज झटके से उनके दोनों कानों में आने लगी- " देख तू सोने का प्रयत्न मत कर, मेरी बात ध्यान से सुन, नही तो मेरे क्रोध का सामना करना पड़ेगा, वैसे भी एक विश्वासी समझकर तुझसे बातें कर रहा हूँ कि तू मेरी बात को जन-जन तक पहूँचाये गा। इधर-ऊधर की बातें छोड़ मेरी बात ध्यान से सुन। जानते हो मैं कितना खतरनाक हूँ ? मैं आज तक न किसी के नजर में,न किसी के पकड़ में आया हूँ। दुनिया के हर बड़े इंजिनियर,डॉक्टर,वैज्ञानिक मेरे पीछे में लगे हुए हैं। परन्तु, वचन देता हूँ तुझे, दुनिया के हर पापियों को खत्म करके ही दम लूँगी मैं और हाँ इस बात को फैलाने में जरा भी आना कानी की न, तुझे अभी सोने की जल्दी है न, सदा-सदा के लिए सुला दूँगी मैं। जाते-जाते अपना पता दे जाती हूँ- “covid-19"। यह सुनते ही लेखक के कान में एक और आवाज टकराती है-" उठिए जी" परन्तु इस बार आवाज मुलायम थी,अपनी पत्नी की। तब लेखक ने देखा सुबह हो चुकी थी।


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