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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 89,जुलाई(द्वितीय), 2020

मानसून

प्रिया देवांगन "प्रियू"

मानसून है आ गया , छाय घटा घनघोर। बिजली कड़के जोर से , वन में नाचे मोर।। पानी गिरते रोज के , हर्षित हुए किसान। उपजाते है खेत में , लहराते हैं धान।। चली हवाएँ जोर से , पक्षी करते शोर। चले किसानी कार्य को , होते ही वह भोर।। झूमें गायें लोग सब , आते ही बरसात । फसल उगाने आज सब , करे कार्य दिन रात।। मानसून की आहटें , मन को खुश कर जाय। हरियाली चहुँ ओर हैं , फसलें भी लहराय।।

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