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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

विश्रामस्थल

शिप्रा खरे

मेरी इन्नोवा कार दो घंटों से लगतार धूल और धूप भरे रास्तों से गुज़र रही थी। जून की चटक गर्मी की तपन पसीने के रूप में मेरे चेहरे पर नज़र आ रही थी तो धर्मपत्नी के चेहरे पर तमतमा रही थी। रास्ते में गाड़ी खराब ना हुई होती तो सुबह पाँच बजे के निकले हम अब तक गन्तव्य तक पहुँच भी गए होते। तब से ए सी भी काम नहीं कर रहा था। पत्नी पहली बार इस तरह के अनुभव से दो चार हुई थीं इसलिए मुँह फेर कर बैठी थीं। सड़क के दोनों ओर दिखाई देने वाले इक्का दुक्का पेड़ मुँह चिढ़ाते नज़र आ रहे थे। दिमाग 'गो ग्रीन सेव अर्थ स्लोगन' रटने लगा। मन ने धिक्करा कि अपने घर के गमलों में दो चार पौधे लगाने से पृथ्वी हरी भरी कैसे कर लेंगे आखिर। तभी धर्मपत्नी की आवाज़ से मेरी तंद्रा टूटी, "यहाँ आस पास कोई रेस्टोरेंट या होटल नहीं होगा क्या ?" इतना सुनते ही मुझे कुछ याद आया। मैं इन रस्तों से अनजान नहीं था। माईलस्टोन पर नज़र पड़ते ही आँखों में उतरती चमक के साथ मैं बोल उठा, "लगभग पंद्रह मिनट बाद एक विश्रामस्थल आएगा, तुम चाहो तो वहाँ कुछ देर रुक कर आगे चल सकते हैं"। पत्नी के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आयी और आँखें बंद कर उसने अपना सर सीट से टिका दिया तो मैं भी हल्के से मुस्कुरा दिया। अश्वासन कितना गहरा असर छोड़ता है, स्पष्ट नज़र आ रहा था। कार के ब्रेक लगते ही पत्नी ने झट से आँख खोली, मैं बिना कुछ कहे कार से नीचे उतर गया तो वह भी दूसरी तरफ से बाहर निकल आयी और इधर उधर नज़र दौड़ते ही पहले वाली मुस्कान से कहीं गहरी और स्निग्ध मुस्कान उसके चेहरे पर उतर आयी। सड़क के दोनों ओर पचास मीटर तक पाकड़ के बड़े-बड़े पेड़ लगे थे और उनकी डालियाँ सड़क के पच्चीस फुट ऊपर एक दूसरे में गुथी हुयी थीं। पेड़ों के चबूतरों पर ठंडी छाया में जाने कितने ही राहगीर विश्राम करने के लिए लेटे बैठे थे।


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