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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

अधूरा मकान

आशीष श्रीवास्तव

‘‘अपने जीवनभर की कमाई से मकान बनवाना चाहा तो वह भी अधूरा रह गया। एग्रीमेंट के बाद भी ठेकेदार बीच में ही छोड़कर चला गया। पूरे एक लाख का चूना लगा गया।’’ दादी आज फिर अपनी बचपन की सहेली से मिली तो कहने लगी।

सहेली: ‘‘यार गौरी, कब तक दुःखी होती रहेगी, पिछले 4-5 महीने से बस एक ही रट, कुछ उपाय करना चाहिए न।’’

गौरी: ‘‘कानून के जानकारों से मदद मांगी, लेकिन सभी ने समझाया कि पैसा और अधिक खर्च हो जाएगा, फिर इस बात की गारंटी नहीं कि मकान पूरा बन ही जाएगा, क्योंकि ठेकेदार ने काम तो किया है।’’

सहेली: ‘‘मेरा नया मकान बन रहा है, मैंने ठेकेदार से कहा था कि रेत-गिट्टी, बोल्डर आने पर मेरी बहिन नगद पैसे देगी, ये लो पूरे एक लाख हैं, अपने शुभ हाथों से ठेकेदार को देना।’’

दोनों बात करते हुए उस जगह पहुंचे जहां सहेली का मकान बन रहा था। गौरी को अपने सामने खड़ा देखकर मकान बनवा रहा ठेकेदार सकपका गया।

गौरी आश्चर्य से अपनी सहेली की ओर देखकरः ‘‘इससे मकान बनवा रही हो, ये तुम्हें कहां मिल गया?’’

सहेली: ‘‘तुम्हारे एग्रीमेंट में चस्पा फोटो से।’’

सहेली ने ठेकेदार से कहाः ‘‘मैंने बताया था न कि बीम डलने से पहले तय रकम की पहली किश्त मेरी बहिन देगी। आज उन्हें हम साथ लाये हैं।’’

ठेकेदार को समझते देर नहीं लगी कि ‘‘जैसे को तैसे’’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। हावभाव बदलते हुए ठेकेदार तुरंत सफाई देने लगाः ‘‘वो एकाएक बीमार हो गया तो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, बहुत पैसा खर्च हो गया, पर आपका काम अवश्य पूरा करेंगे।’’

दोनों सहेलियों को चुप खड़ा देखकर ठेकेदार ने कहाः ‘‘आपको परेशान होना पड़ा, भरोसा रखिए, दोनों मकान जल्द बन जाएंगे। अब कोई शिकायत नहीं मिलेगी!’’

गौरी: ‘‘मुझे ऐसी ही उम्मीद थी, पर लगता है अब हमारा मकान बन गया है।’’

दोनों सहेलियां एक-दूसरे की ओर देख मुस्कुरा उठीं, और ठेकेदार नदारद।


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