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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

गर्मी के दोहे:
पानी-पानी प्राण......

घनश्याम बादल

सूरज बदला ले रहा , गरमी करे प्रहार । धूप हुई बैरन बड़ी , छांव बांटती प्यार।। नदिया सूखी नार सी , पोखर हैं बेहाल । बादल खाली घूमते , फिरें बजाते गाल ।। पानी ‘पानी’ पा रहा , पानी-पानी प्राण । किरणें ऐसे बींधती , जैसे बींधें बाण ।। बादल अब बा-दल चलें , धरती रही पुकार । या तो मौला तू बरस , या ले, ले अब प्राण ।। फा़के़ से बुढ़िया मरे , गरमी मरे जवान । बनिया मंदी से मरे , सूखे मरे किसान ।।


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