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वर्ष: 2, अंक 41, जुलाई(द्वितीय), 2018



‘अकेलेपन’ का अहसास


अरुण कान्त शुक्ला


टूट रही थी सांस 'मेरी' और जुबां सूखी थी,
तुझे नहीं पुकारा था, 'चंद बूँद' पानी की जरुरत थी |

तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, 
मेरे लबों को नहीं, मेरे सर को तेरी गोदी की जरुरत थी|

इश्क में तू करता रहा वादे पे वादे ,
मुझे तेरे वादों की नहीं, तेरी वफ़ा की जरूरत थी|

तेरे नाले मुझसे थे तेरा माशूक था कोई और,
तुझसे इश्क मेरी गलती थी, तुझसे नफ़रत ‘उस वक्त’ की जरुरत थी|

क़यामत के रोज पूछियेगा, अख़लाक़ से, ‘अकेलेपन’ का अहसास,
हम प्यालों, हम निवालों के बीच अकेला, जब किसी 'अपने' की उसे शिद्दत से जरुरत थी|


		 
 

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