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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



उपभोक्तावाद का उस्तरा


राजेन्द्र वर्मा


जब-जब सरकार के दायित्व की पूर्ति की बात उठती है, तो लोग विपक्षी दलों की तरह ग़रीबों के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं- उन्हें रोटी-कपड़ा मिला? मकान मिले? उनके बूढ़े माँ-बाप की दवाई की व्यवस्था हुई? उनके बच्चो की पढ़ाई के लिए सरकार ने क्या किया? ये सवाल ऐसे दागे जाते हैं जैसे इससे पहले वाली सरकारों ने बस ग़रीबों के लिए ही काम किया हो! सरकार जानना चाहती है कि आख़िर लोग अमीरों के बारे क्यों बात नहीं करना चाहते? उनमें क्या काँटे लगे हैं? आख़िर यह असमानता क्यों? संविधान के अनुच्छेद 14 में भी ‘समानता के अधिकार’ की बात कही गयी है। अमीर या ग़रीब के बारे में कुछ नहीं कहा गया है! इसलिए सरकार का फ़र्ज़ बनता है कि अमीर और ग़रीब, दोनों का बराबर ध्यान रखा जाए!

नागरिक शास्त्र का छात्र भी जानता है कि सरकार ग़रीब-अमीर, दोनों से बनती है। ग़रीब अपना क़ीमती इन्वेस्ट करता है, तो अमीर पैसा! मंझोला अमीर वोट और पैसा, दोनों इन्वेस्ट करता है! इसलिए, दोनों को ब्याज सहित रिटर्न पाने का अधिकार है। सरकार इतनी कृतघ्न नहीं कि वह ग़रीबों के वोटों का हिसाब रखे और अमीरों के धन का हिसाब न रखे! पार्टी के चुनाव जीतने और सरकार बनने में जो खर्च आता है, सरकार उसको कैसे भूल सकती है! वह एक-एक पाई का हिसाब देगी- दो गुने से लेकर दस गुना तक करके! इसमें अगर किसी ग़रीब के पेट में दर्द होता है, तो सरकार मजबूर है!... आख़िर ‘मेक इन इंडिया’ अथवा देश में निर्माण में कौन अधिक योगदान करता है? सीधी-सी बात है उद्योगपति! यानी अमीर! ग़रीब किसान और मजदूर जितना उत्पादन करते हैं, उसे वे ख़ुद ही खा डालते हैं- देश की जी.डी.पी. में तो उसकी गिनती ही नहीं होने देते! मजदूरों के पास तो सरकार को देने के लिए एक वोट के अलावा क्या है, लेकिन किसानों के पास तो खाने से अधिक अनाज पैदा होता है! तब भी वे सरकार को एक रुपया टैक्स नहीं देते- कहते हैं, एग्रीकल्चरल इनकम है! क्यों टैक्स दें? जबकि उद्योगपति टैक्स तो देता ही है, और वक़्त-ज़रूरत मदद करने में पीछे नहीं हटता! तो, सरकार का भी कुछ फ़र्ज़ बनता है कि नहीं?

कृषि उत्पादन में जो ज़रूरी चीज़ें हैं, उसका इंतजाम सरकार करती है- सिंचाई-खाद वगैरह में छूट से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य तक! औद्योगिक स्तर पर भी उसे ही फोकस करना पड़ता है! यह देखना उसकी जिम्मेदारी है कि देश में टी.वी.,फ्रिज, कम्प्यूटर, मोबाइल, मोटरसाइकिल, कार, शैम्पू, सेंट आदि का जो निर्माण हो रहा है, उसमें कोई अड़चन तो नहीं आ रही! फैक्टरियों को सस्ती बिजली बराबर मिल रही है! उन पर कोई नाजायज़ दबाव तो नहीं डाल रहा? सरकारी विभाग ठीक से सहयोग कर रहे हैं ! फैक्ट्री की बनी चीज़ें समय पर बाज़ार में पहुंच रही हैं या नहीं? प्रचार माध्यमों के द्वारा वे लोगों तक अपने उत्पादों की जानकारी दे पा रहे हैं कि नहीं? इसके लिए उन्हें पर्याप्त विज्ञापन जुट रहे हैं या नहीं!...

सरकार की जानकारी में है कि चन्द मंत्रियों और अधिकारियों की शह पर कॉर्पोरेट घराने असीमित लाभ कमाने की योजना लागू करा लेते हैं! खेती की ज़मीन पर पेप्सी, कैम्पा कोला, बियर, मैगी, चोको जैसी कोई भी फालतू चीजों की नेशनल या मल्टी-नेशनल फैक्ट्री डाल लेते हैं और किसानों को मजदूर बना लेते हैं! देश ने नौजवानों को जितनी मोटरसाइकिलों और कारों की ज़रूरत है, उससे वे सौ गुना उत्पादन कर लेते हैं और फिर ग़रीबों के बच्चों में मोटरसाइकिल पर चलने का सपना जगाते हैं ताकि वे स्वयं अरबपति-खरबपति बन सकें! गाँव उजाड़कर अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं, क्योंकि बिल्डरों के पास अकूत पैसा है और उनकी कंपनियों में सरकार के मंत्रियों और विपक्षियों का भी पैसा लगा है! कोई इसे कैसे रोक सकती है?

सरकार को पता है कि अखबारों से लेकर सैकड़ों टी.वी. चैनल घने-काले, मुलायम और मज़बूत बाल बनाने वाले शैम्पू और तेल के विज्ञापन की मलाई खा रहे हैं ताकि वे जमुहाई लिये बगैर ही अमीरों के साथ खड़े रहें जिन्होंने या तो उन्हें श्वास प्रदान किया है अथवा उनमें रक्त और मज्जा भरी है! लेकिन वह मजबूर है। वह इस पर रोक नहीं लगा सकती। अव्वल, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नामक मूल अधिकार की शाखा के हरे-भरे पत्ते हैं। आप जानते ही हैं कि हरा पेड़ या उसकी शाखा काटना सरकार की नीति के विरुद्ध है! दूसरे, ये उन्हीं के ही अखबार और टी.वी. चैनल उन कंपनियों के आज्ञाकारी चहबच्चे हैं। इसीलिए, रह-रह कर उन्हें विज्ञापन का बुखार चढ़ता है- “बारह घंटे तक अगर कीटाणुओं से लड़ना है कि फलां-फलां टूथपेस्ट इस्तेमाल करें।” अथवा, “बच्चे दूध नहीं पीते, रोटी नहीं खाते- कोई बात नहीं! उन्हें मैगी-चोको खिलाइए, बोर्नवीटा पिलाइए!”... टिंग-टोंग!... दृश्य देखिए- मोटर साइकिल पर हीरो बैठ गया है। अभी वह अगले पहिये पर सारा वजन डाल पिछला पहिया दायें से बायें कर देगा- इतना पावर है बाइक में! टायर उसके फिसल ही नहीं सकते! मंझे से टूटी हुई पतंग को वह मोटरसाइकिल से भतीजे को दन्न से पकड़ा देगा! अंकल और भतीजे- दोनों खुश ! और क्या चाहिए देश को?... ऐसी कार बन चुकी है कि उसके आगे घोड़ा दौड़कर भी नहीं दौड़ता! उसे अपना धर्म मालूम है। वह कार को पीछे आते देख घबराता है।... कच्चा-पक्का रास्ता छोड़ नदी-नाले होता हुआ समतल पहाड़ी पर दौड़ने आता है। वह डायरेक्टर की मानता है- पहाड़ी पर गोल-गोल न भागे, तो बच्चू गिरे खाई में!

किसी न्यूज चैनल पर यदि कोई विज्ञापन आ गया, तो सभी चैनल विज्ञापन ही दिखायेंगे। भले ही किसी न्यूज के ‘वैलीडेशन’ के लिए गंभीर दृश्य दिखाया जा रहा हो- लोग भूख से मर रहे हैं, जल कर मर रहे हैं, एक्सीडेंट से मर रहे हैं, बलात्कार हो रहा है, बलात्कृत महिलाएं-बच्चियां मारी जा रही हैं या उनकी लाशें पेड़ से लटकी हुई हैं! पलक झपकते ही विज्ञापन शुरू- केश काले करने की डाई अथवा लड़की पटाने के लिए सेंट के स्प्रे! बिटिया को हर हाल में गोरा होना है! मोबाइल में मेसेज आयेगा- मुझसे दोस्ती करोगे? मैं अकेली हूं! मैं आपकी तन्हाई दूर करूंगी! मुझसे बातें करो। चार्ज केवल पांच रुपये प्रति मिनट!....रोना यह है कि विज्ञापन देश की सरकारी संस्था- बी.एस.एन.एल. कर रहा है। अख़बारों का भी वही हाल है. विज्ञापन से कमाई के चक्कर में न जाने क्या-क्या छप रहा है- दोयम दर्जे के अखबार में भी आधे पेज के रंगीन विज्ञापन में युवती के बालों में रूसी के विरुद्ध मोर्चा खुला हुआ है, तो चौथाई पेज पर युवकों को गोरा बनाने वाली क्रीम ने कब्ज़ा कर रखा है! लगता है, हम फिर देह की मंडी में लौट रहे हैं!... मूठ मारने वाले बाबा से लेकर के जापानी तेल के विज्ञापनों ने मति-भ्रष्ट के ठेका पहले ही उठा रखा है!

जब से टी.वी. चैनलों ने न्यूज़ बेचने का मोर्चा सँभाला है, अख़बार तो बस विज्ञापनों के लिए छप रहे हैं! विचार नामक चिडि़या तो कब की उड़ चुकी है! दृश्य मीडिया तो सेक्स और हिंसा की आरती करने में लगा है। देश के मुद्दे अपनी मौत मर रहे हैं, पर व्यवस्था के विरुद्ध वे जु़बान खोले भी तो कैसे?... इधर जु़बान खोली, उधर विज्ञापन कटा! एक-एक दृश्य लाख-लाख रुपये का है, पर कन्ज़्यूमर के लिए निःशुल्क! क्यों भाई? आप इतने दानी कब से हो गये? कौन नहीं जानता कि सैकड़े की पौध लाखों में कटती है! शराब को मीडिया ने लोकप्रिय बना दिया और सरकार राजस्व के नाम पर हिस्सा बंटा रही है ताकि उसके मंत्री ऐयाशी कर सके! उपभोक्ता के घर पर उपभोक्तावाद की ड्यटी लग गयी! जंगल में शेर से कोई कैसे बचे?

उपभोक्ता को भेंड़ा बनाने से पहले उसे उपभोक्ता-वस्तु मुफ़्त में खिलानी-पिलानी पड़ती है। साठ के दशक में ‘लिप्टन’ चाय ग्रामीण क्षेत्रों में चाय की छोटी-छोटी पुडियां मुफ़्त बाँटती थी। फिर दसेक वर्ष में ‘लिप्टन’ और अन्य चाय-कंपनियों ने गाँवों में पाँव जमा लिये।... बीड़ी की अधिकाधिक खपत हो, इसलिए ‘भगवानदास जैन’ ने ‘बालक बीड़ी’ के बंडलों में बाल्टी-तसला, मग्गा आदि की पर्चियां रखनी शुरू कीं। धीरे-धीरे बीड़ी की खपत इतनी बढ़ गयी कि कंपनी की बैलेंस शीट का साइज़ भी बढ़ा और लाभ चौगुना हो गया! तरह-तरह की सिगरेटें, पान-मसाला, मीठी सुपारी-सौंफ जैसी ज़हरीली वस्तुएं कौन किसके इशारे पर बेच रहा है? पचास ग्राम वाले ‘रिन’ साबुन के दामों में बीस ग्राम एक्स्ट्रा अथवा, ‘एरियल’ के आधा किलो पैक के साथ पचास रुपये की कीमत की बाल्टी मुफ़्त, फलां टी.वी. के साथ फलानी कंपनी का डी.वी.डी. फ्री, फलां कंपनी के फ्रिज के साथ वोल्टेज स्टैबलाइज़र फ्री जैसे ऑफरों से सभी मगन हैं!... मुफ़्त की आदत न अच्छा-ख़राब देखती है और न ही ज़रूरत-बेज़रूरत! ‘एक के बदले दो’ की आदत पड़ जाने पर ही उपभोक्तावाद अपना उस्तरा ठीक से चला पाएगा!.. हमें तो पहले ही मूड़ मुड़ाने की आदत है- कर्मकाण्ड धार्मिक हो अथवा आर्थिक! ००

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