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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



“दर्द” का अहसास


सौरभ “ जयंत” दत्ता


रविवार की सुबह खिड़की किनारे बैठ चाय की चुस्की लेते हुए प्रकृति के मनोरम दृश्य निहार रहा था, आज इस चाय की चुस्की ने मुझे ३४ वर्ष पूर्व घटी एक घटना की याद ताजा कर दिया और मुझे उस सवाल का जवाब मिल गया जिसे मैं बरसों से अपने दिल में बोझ लिए घूम रहा था या यूँ कहें उस दर्द का अहसास करा गया जिससे मैं आज तक अंजान था. अमूमन किसी मित्र या सम्बन्धी से मिलना चाय के बिना अधुरा है , पर मेरा तो चाय से गहरा दिल का रिश्ता है. अब सोचेंगे भला चाय का दिल से क्या रिश्ता हो सकता है, पर सच मानिये मेरा चाय से उसकी पहली चुस्की से ही रिश्ता जुड़ गया था.

आधिकारिक रूप से जब मैंने पहली चाय की चुस्की ली थी मेरी उम्र शायद १४ वर्ष से कुछ कम रही होगी, इसे आधिकारिक ही कहूँगा उस दिन मुझे पहली बार मेरी माँ ने चाय पीने के लिए आग्रह किया था. यह उस समय की बात है जब असमय ही मेरे पिताजी का देहावसान हो गया, सारे नियमों एवं रीतिरिवाजों से फारिग होने के पश्चात हम अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटने एवं समय के साथ सामंजस्य बिठाने का प्रयास कर रहे थे. ऐसी ही एक सुबह माँ ने चाय का प्याला थमाते हुए कहा चलो साथ में चाय पीते हैं, मैंने इंकार किया , फिर उनकी इच्छा का मान रखते हुए, चाय हलक के नीचे उतर लिया और शनैः शनैः मेरी दिनचर्या में चाय का समावेश हो गया.

उस वक़्त माँ की कही बातों का मर्म समझने की शायद न तो मेरी उम्र थी और न ही मैंने समझने का प्रयास किया, मेरे लिए उनकी ख़ुशी ही सर्वोपरि था. उनका मुझे चाय पिलाने के पीछे छुपे दर्द का अहसास उम्र के ४८ वें वसंत में आकर हुआ. उनके वे शब्द “ मुझे अकेले चाय पीना अच्छा नहीं लगता” ने मुझे उस अकेलेपन के दर्द का अहसास कराया.

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