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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



अमानत


सविता मिश्रा 'अक्षजा'


माँ को मरे पांच साल हो गए थे। उनकी पेटी खोली तो उसमें गहनों की भरमार थी। पापा एक-एक गहने को उठाकर उसके पीछे की कहानी बताते जा रहे थे|

जंजीर उठाकर पापा हँसते हुए बोले- " तुम्हारी माँ मेरे से छुपाकर यह जंजीर पड़ोसी के साथ जाकर बनवाई थी।"

"आपके चोरी, पर इतना रुपया कहाँ से आया था ? "

"तब इतना महंगा सोना कहाँ था! एक हजार रुपये तोला मिलता था। मेरी जेब से रुपये निकालकर इकट्ठा करती रहती थी तेरी माँ। उसे लगता था कि मुझे इसका पता ही नहीं चलता । किन्तु उसकी ख़ुशी के लिए मैं अनजान बना रहता था।

बहुत छुपाई थी यह जंजीर मुझसे, पर कोई चीज छुपी रह सकती है क्या भला !"

तभी श्रुति की नजर बड़े से झुमके पर गयी।

"पापा, मम्मी इतना बड़ा झुमका पहनती थीं क्या ?" आश्चर्य से झुमके को हथेलियो के बीच लेकर बोली|

"ये झुमका, ये तो सोने का नहीं लग रहा। तेरी माँ नकली चीज तो पसन्द ही न करती थी , फिर ये कैसे इस बॉक्स में सोने के गहनों के बीच रखी है।"

"इसके पीलेपन की चमक तो सोने जैसी ही लग रही है पापा !!"

" कभी पहने तो उसे मैंने नहीं देखा। और वह इतल-पीतल खरीदती न थी कभी।"

तभी भाई ने -"पापा ले आइये सुनार को दिखा दूंगा" कहकर झुमका हाथ में ले लिया।

बड़े भाई की नजर गयी तो वह बोला -"हाँ ले आइए पापा कल जा रहा हूँ सुनार के यहाँ, दिखा लाऊँगा ।"

दोनों भाईयों के हाथों में झुमके का जोड़ा अलग- अलग होकर अपनी चमक खो चुका था। दोनों बेटों की नजर को भाँपने में पिता को देर नहीं लगी।

बिटिया के हाथ में सारे गहने देते हुए पिता ने झट से कहा- "बिटिया बन्द कर दे माँ की अमानत वरना बिखर जायेगी।"

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