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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



पिता की सीख


गोवेर्धन यादव


सखाराम को वॄद्धाश्रम आये हुये काफ़ी दिन हो गये थे, लेकिन उसे अपने घर की याद खूब सताती थी , क्योंकि उसने अपना पेट काट- काटकर खडा जो किया था. पत्नि के गुजर जाने के बाद से जबसे उसने अपने घर की चाभियां अपनी बहू के हाथों में सौंप दी थी, उसी दिन से उसका बुरा हाल होना शुरु हुआ था.

  उसने अपने बेटे से अपने ऊपर होने वाली दुर्दशाओं के बारे में बतलाना भी चाहा तो बेटे ने दो टूक उत्तर दिया था" पिताजी...समय के साथ चलना सीखें और समझौता करने की आदत. हमारे पा समय नहीं है कि आप की तिमारदारी करते फिरे."

   बेटे का उत्तर सुनकर उसने गहरी चुप्पी ओढ ली थी. अब वह अंदर ही अंदर गलने लगा था. एक दिन ऎसा भी आया के उसे वृद्धाश्रम भेज दिया गया, वृद्धास्श्रम के अन्य लोग उसे ढाढस बंधाते लेकिन उसका धेर्य जबाब दे जाता. धीरे-धीरे अब वह वहाँ रहने का आदी हो गया था, लेकिन घर की यादें उसका पीछा नहीं छोड रही थी. जब तक वह घर में था ,अपने पोते के साथ खेलता ,हंसता, बतियाता था. उसे जब- तब उसकी याद आती. उसे याद आया की परसॊं पोते का जन्मदिन है. वह उसे बधाइयाँ देना चाहता था. उसने अपने बेटे के नाम एक पत्र लिखा.

  ” प्रिय बेटे

  . परसों पप्पू का जन्मदिन है,. उसे मेरी ओर से बहुत -बहुत प्यार और अनेकानेक शुभकामनायें देना. शब्दों के अलावा अब मेरे पास है भी क्या जो मैं उसे दे सकता हूँ. उसे खूब पढा-लिखाकर होशियार बनाना, लेकिन यह बात ध्यान रखना कि उसे ज्यादा होशियार मत बना देना, अन्यथा एक दिन वह तुम्हें भी वृद्धाश्रम का रास्ता बतला देगा."

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