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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



दोराहा


डॉ. राम प्रकाश सक्सेना


आठ साल के अजय ने कंधे पर बस्ता लटका लिया, फिर अपने पापा प्रशांत बाबू से कहा, ‘‘ अब जाऊँ न पापा?’’

‘‘ जाओ बेटे। तुमने अपना लंचबॉक्स नहीं लिया ?’’

‘‘ आज तो दस बजे ही पूरी छुट्टी हो जाएगी। सटरडे है न।’’

‘‘ अरे हाँ, याद ही नहीं रहा। अच्छा एक सेब तो लेते जाओ। ’’

‘‘ नहीं पापा, मुझे सेब अच्छा नहीं लगता। घर आकर खा लूँगा। आप मेरी फिक्र नहीं करना। अच्छा पापा, मैं जा रहा हूँ।’’

अजय के जाने के बाद प्रशांत उसकी बिखरी चीज़ों को बटोरने लगा--अजय का छोटा सा नाइट सूट, चप्पलें, टॉवल, पॉलिश की डिब्बी और ब्रश। सुबह सात बजे अजय के स्कूल की बस आ जाती है। उससे पहले ही प्रशांत को सब तैयारियाँ करनी पड़ती हैं- नाश्ता, अजय के लिए लंच का बॉक्स, पराठे या पूरियाँ सब्ज़ी, सलाद आदि। उसे अचार अच्छा लगता है, जलेबी भी। दोनों चीज़ें प्रशांत रखना नहीं भूलता। रोज़ सुबह चार बजे उठ जाना पड़ता है। अजय के सो जाने के बाद साढ़े नौ बजे तक उसे फुरसत नहीं रहती। शेव बनाने, नहाने और कुछ खाकर ऑफिस जाने का समय होता। तब तक अखबार भी पढ़ लिया जाता। अजय स्कूल से दो बजे लौटता, तब वह घर पर नहीं होता। अजय घर में आकर सब साफ़-सुथरा पा सके, उसको भूख लगे तब अपनी मनपसंद चीज़ें निकालकर खा सके, इसका प्रबंध करके ही वह ऑफिस जाता। पिछले महीने स्कूटर खरीदा था। घर आठ मील दूर ऑफिस था। शाम को वह ऑफिस से सीधा घर पहुँचता। अजय अच्छी तरह अपने पड़ोसी साथी के साथ खेल रहा है तब उसे बहुत राहत पहुँचती। फिर बाप बेटे चाय पीते, बैडमिंटन खेलते। अजय अपना होमवर्क करने बैठ जाता और प्रशांत खाना पकाने जुट जाता। गैस मिल जाने से बहुत सुविधा हो गई थी। रात को खा पीकर दोनों एक ही पलंग पर एक दूसरे से लिपट कर सो जाते। अजय को सुलाने के लिए वह कभी एक दो गीत गा देता या मन से बनाकर कोई मज़ेदार कहानी। अजय ‘गुड नाइट’ कर चुपचाप सो जाता, फिर भी देर तक प्रशांत जागता रहता।

कितनी ही बातें होतीं सोचने के लिए। संतोष करने के लिए भी कुछ हो गया था। अभी छह महीने पहले सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर प्रशांत और अजय अनिश्चित यात्रा पर निकल पड़े। पीछे जो भी था, सब कुछ छोड़कर। उसे हमेंशा लगता कि अजय में उससे अधिक विवेक है। अपनी माँ से बिछड़ने का दुख बच्चे को तोड़ देता है। राजश्री के पास मिनी और संजू रह गए थे। ग्यारह की मिनी, पाँच का संजू सोलह साल की ग्रहस्थी बिखर गई। वह साल भर पर्यटन करता रहा, पर दुख पर विजय नहीं पा सका। उसे डिग्रेड कर दिया गया, तब उसने त्यागपत्र दे दिया। इतनी भागदौड़ के बाद एकदम से बेकार हो जाना उसे तोड़ने लगा था। राजश्री पिछले आठ वर्ष से शिक्षिका थी, इसलिए खाने पहनने की समस्या का बड़ा प्रश्न चिह्न नहीं उभरा था। फिर दो वर्ष तक की बेकारी, राजश्री की कमाई पर निठल्ले पति के ऊपर बरसते ताने। उसके बाद लंबे लंबे आपसी मनमुटाव और कलहबाजियाँ। ’तुम मुझे एक क्षण को भी अच्छे नहीं लगे, तुम्हारा स्पर्श मुझे सदैव रेंगते कीड़े की तरह लगता रहा । तुम सचमुच एक अजीब आदमी हो। दुनिया में तुम्हारे जैसा अजीब एक भी आदमी नहीं है। मेरा भाग्य ही फूट गया। ’ वह सुनता, ‘‘ मैं तुम्हारे न होने पर आनंद से रह सकती हूँ। कभी भी चले जाओ बाबा और कुछ काम करो। तुम्हारे यहाँ रहने से मैं अपनी तंदुरुस्ती भी नहीं ठीक कर पाती। कौन सा दिन होगा जब तुम्हारा निकास होगा।’’

एक से एक कर्कश, असहनीय वाक्यों से राजश्री उसे छेद देती। कभी कभी उसे लगता कि एक मात्र विश्वास था, जिस पर ग्रहस्थी किसी तरह टिकी थी, वह भी डगमगाने लगा था। राजश्री को इन दिनों राजेंद्र मोहन से गहरा लगाव होता जा रहा था। दूर के रिश्ते में भतीजे लगते थे। राजेंद्र उसी शहर के कॉलेज में लेक्चरर था। विवाह के नाम पर वह प्रशांत से निसंकोच कह जाता, ‘‘बुआ, शादी करूँगा तो उसीसे जो तुम्हारी डुप्लीकेट कॉपी हो। ’’

पैतृक संपत्ति के नाम पर गाँव में कुछ ज़मीन थी। उसी को आध बटाई पर उठाकर वह दूर शहर में नौकरी कर रहा था। बेकारी में उसने उस ज़मीन को जीविका बनाने का सोचा। जो थोड़ा-बहुत बैंक बैलेंस था, उसमें अधिकांश भाग राजश्री के वेतन का था। राजश्री के नाम पर ही अकाउंट था। उसकी प्रत्येक स्कीम को सुन राजश्री उसे हतोत्साहित कर देती।

‘‘ बाबा रे, तुम जिस चीज़ में हाथ डालोगे, वह सड़ जाएगी, यह निश्चय है। तुमसे कोई काम नहीं हो सकेगा। चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहो और रोटियाँ तोड़ते जाओ। ’’

आखिर वह गॉव गया। छह बीघा ज़मीन तो एकदम ही बंजर और बेकार थी। नाले ने बह-बहकर खेत की ऊपरी मिट्टी को बहा दिया था। पथरीली ज़मीन पर छह-सात इंच मोटी मिट्टी की अनुपजाऊ परत बची थी। इसलिए वह गाँव में टिक न सका। राजश्री ने उसके लौट आने पर और भी ताने दिए। पंद्रह दिन वह घर से दूर रहा। लौटने पर उसने सोचा था कि राजश्री को उसकी अनुपस्थिति आख़िरी होगी। अब शायद प्यार से मिलेगी, हो सकता है कर्कश वाणी और व्यवहार पर खेद भी प्रकट करे। यह सब कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ था उसे भुलाने के लिए वह बड़ी से बड़ी कीमत भी देने को तैयार हो गया।

रात के पौने दस बजे वह घर लौटा था। जीने पर चढ़ने के बाद उसने आवाज़ दी। दो तीन बार दरवाज़ा थपथपाया। फिर मिनी ने दरवाज़ा खोला था। बाहरी बैठक में कोई नहीं सोता था। पर उस दिन उसने देखा मिनी, संजू और अजय तीनों ही फर्श पर गद्दे बिछाकर सोए थे। मिनी फिर से गहरी नींद में सो गई। तब राजश्री दूसरे कमरे से निकलकर आई थी।

‘‘ आ गए श्रीमानजी ?’’ उसने कहा था।

उसने राजश्री से पूछा’’ आज ये बच्चे यहाँ क्यों सो रहे हैं। ‘‘

’’ये लोग अब यही सोने लगे हैं। राजेंद्र यहाँ रहने आ गया है। उसे वह कमरा ही सुविधाजनक लगा।’’

‘‘ यहाँ क्यों आया ?’’

‘‘ क्यों क्या यह पराया घर है ? बेचारा हज़ारों तकलीफें अकेला वहाँ उठाता रहता है। उससे मकान खाली करवा लिया। खैर, खाना खाकर आए हो या कुछ बनाना शु: करूँ। कम से कम चिट्ठी डालकर आने की तो लिख देते। बोलो खाओगे ?’’

‘‘ नहीं।’’

‘‘ तब ठीक है। राजेंद्र तो सो गया है। उसे जगाना ठीक नहीं होगा। तुम यहीं अजय के पास ही सो जाओ। कल यहाँ चारपाई को ऐडजस्ट कर देंगे।’’

‘‘क्या कहती हो तुम ? तुम इस कमरे में सोओगी ?’’

‘‘ मुझे सुबह ही राजेंद्र पढ़ाता है। अभी अभी पढ़ाकर सोया है। इस साल मैं एम. ए. में बैठ रही हूँ। ’’ अधिक देर राजश्री वहाँ ठहरी भी नहीं।

’’ सोने से पहले लाइट बुझा देना। पतंगें कीड़े बहुत से आ रहे हैं। और कुछ चाहिए आपको ?’’

‘‘नहीं।’’

वह सारी रात जागता रहा था। एक तरह से अब सब स्पष्ट हो गया था। पहले दो तीन बार उसे राजश्री और राजेंद्र के बारे में पक्का शक हुआ था, कुछ लोगों के मुँह से दबी-छुपी ज़बान में भी वैसी भनक पड़ी थी, पर कभी वह उन्हें पकड़ नहीं पाया। पिछले महीने तो अजय ने एक वाक्य कहकर उसे स्तंभित कर दिया था। राजश्री से वह उसकी कलाई पर लगी गहरी खरोंच के बारे में पूछ रहा था तब राजश्री ने बाथ:म के दरवाज़े की कील से लगने का बताया था। जब अजय ने उसे कुछ देर बाद अलग से बताया, ‘‘ पापा, मम्मी झूठ बोल रही थी। जब देखो, तब राजेंद्र भाई साहब और मम्मी कुश्ती करने लग जाते हैं। कल तो राजेंद्र भाई साहब ने मम्मी को गिरा भी दिया था। तभी मम्मी को ब्लाउज़ के हुक से खरोंच लगी थी। राजेंद्र भाई साहब मम्मी को पुचकार पुचकार कर प्यार करने लगे थे।’’

‘‘तू वहीं बैठा था तब ?’’

‘‘ नहीं, मैं चुपचाप रसोई घर के दरवाज़े से झाँक रहा था। मम्मी बहुत खराब हैं पापा।’’

उस रात राजश्री और उसके बीच बहुत झगड़ा हुआ था। राजश्री ने उसे नीच, शक्की और अतिशय गंदा आदमी बताकर अपनी फूटी तकदीर पर आँसू बहाए थे। दो दिन तक पति पत्नी के बीच एक भी शब्द बोला नहीं गया। फिर वह गाँव चला गया था। वह डर के बोझ में दब गया था।

सुबह सुबह उसे नींद आई थी। जब जागा था। तब तक राजश्री अपने स्कूल चली गई थी। राजेंद्र मोहन बरामदे में बैठा बड़े मज़े से शेव बनाता हुआ गुनागुना रहा था। मिनी उसे कभी गर्म पानी, कभी तौलिया, कभी शेव लोशन ला लाकर पकड़ा रही थी। वह पूरे जोश में हुक्म चला रहा था।

उसे देखकर राजेंद्र ने कहा, ‘‘ बड़ी देर तक सोने की आदत लगा लाए, फूफाजी।’’ उसने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था, तब राजेंद्र ने मुँह बिचका दिया था।

दोपहर के दो बजे राजश्री स्कूल से आई। तब घर में वह अकेला था। राजश्री खाना खा चुकी, तब उसने उसके पास जाकर कहा, ‘‘ तुम यह सब जो कर रही हो ठीक है, राजश्री ?’’

‘‘ क्या कर रही हूँ मैं ?’’

‘‘ बनो मत। अब मेरी आँखों के सामने जो घट रहा है वह देखने के बाद कुछ भी छुपा नहीं है। तुम इतनी गिर जाओगी, यह मैंने नहीं सोचा था। ’’

‘‘ अपनी ज़बान को ज़रा लगाम लगाओ तुम। फालतू बकवास सुन सुनकर मैं तंग आ गई हूँ। तुम्हारी जो मर्जी आए, सोचो, जो मर्जी में आए, करो। मुझसे बात करने की ज़रूरत नहीं है।’’

वह उसके पास से हटने लगी, तब उसे पकड़कर उसने वहीं बैठा दिया था। आवेश में काँपते हुए उसने कहा था ‘‘ नीच औरत, ज़रा अपने बच्चों का ख्याल कर।’’

क्रोध से उबलती हुई राजश्री ने कहा था, ’’ हट जा मेरे सामने से, नीच आदमी। बड़ा आया बच्चों का ख्याल रखने वाला। बड़ी कमाई करके ख्याल रख रहा है जैसे। टुकड़े तोड़ निकम्मों की ज़बान में भगवान कीड़े भी नही डालता। ज़रा सी शर्म-हया हो तो कोई भी आदमी किनारा कर जाता। एक से एक बेशर्म हरामखोर दुनिया में जन्म लेते हैं।’’

उसके बाद मार-पीट हुई थी। शाम को राजेंद्र ने आकर फैसला किया था ‘‘फूफाजी, बुआ से इतना जुल्म बर्दाश्त नहीं हो सकेगा। आप मेंहरबानी करके यहाँ से दफ़ा हो जाइए।’’ ’’तुम मुझे मेरे घर से हटाने वाले कौन हो साले। शट अप एंड गेट आउट फ्रम हियर।’’

राजेंद्र ने कहा था ‘‘ मज़ा तो अभी चखा सकता हूँ , पर मरे हुए को मारना नहीं चाहता। मैं ज़्यादा शोर-शराबा पसंद नहीं करता। आप यहाँ से अभी दफ़ा हो जाएँ। अगर आदमी हो तो फिर यहाँ चेहरा न दिखाना। ’’

तनकर राजश्री भी दरवाज़े पर कमर कसे खड़ी हो गई थी। अजय ही बोल पड़ा था ‘‘ पापा, चलो हम दोनों चलें। यहाँ हमें एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। मैं आपका सब काम कर दूँगा। मुझे यहाँ छोड़ जाओगे तो ये दोनों मुझे मार डालेंगे। देखिए, मेरी पीठ पर अब तक बेंत की चोटें दर्द करती हैं। ’’ बच्चे ने अपनी कमीज उठाकर हड्डी वाली गोरी पीठ उघाड़कर बेंत की चोटें दिखा दी थीं।

उसका सिर चकरा गया था। उसने आग्नेय नेत्रों से राजेंद्र और राजश्री को देखा था। राजश्री ही राजेंद्र का हाथ पकड़ कर अंदर के कमरे में ले गई थी।

अजय के कपड़े संदूक में से निकाल कर राजश्री ने अपने कमरे से बाहर फेंक दिए थे। एक टूटा सा सूटकेस भी फेंक दिया था। फिर धड़ाम से कमरे का दरवाजा बंद कर लिया गया था।

अजय और वह दस मिनट बाद ही स्टेशन के रास्ते पर चल पड़े थे। उसकी जेब में पाँच सौ रुपए और कुछ रेजगारी थी। बड़े ही शुभ महूर्त में घर से निकास हुआ था। ताँगे पर बैठे हुए सेठ गोपालदास ने अपना ताँगा रुकवाकर पूछा था, ‘‘ साहब बहादुर, स्टेशन चल रहे हैं क्या ?’’

‘‘ जी हाँ। ’’

‘‘ तब आजाइए, आपका ही ताँगा है। पधारिए हुजूर। ’’

अजय दौड़कर ताँगे के पास पहुँच गया। स्टेशन तक सेठजी उससे मौसम, फसलों और गाड़ियों के लेट चलने के बारे में बोलते रहे। फिर अचानक ही कुछ याद आ गया उन्हें। एक ओर उचककर कमीज के अंदर बनियान में हाथ डालकर कुछ टटोलते रहने के बाद सौ सौ के चार नोट उसे पकड़ा कर बोले ‘‘ ले लीजिए, बाबू साहब। वायदा हम लोग कभी नहीं भूलते। भले ही आप हमारे अफ़सर नहीं रहे, पर आपकी तरफ़ जो देना सोचा था, उसे चुकाने में मुझे बड़ी तसल्ली हो रही थी। लीजिए, रखिए न साहब ‘‘।

’’ ले लो न पापा। ’’ अजय ने कहा था।

सेठजी का आभार व्यक्त करना उसे नहीं आया। उसकी आँखें नम हो आईं थीं, गला रुँध गया था। सेठजी आदमी को शक्ल देखकर ही पहचानने वालों में से थे। सत्तर साल की उम्र का तजुर्बा था। बोले, ‘‘ जी हल्का मत करो, बाबू साहब। उतार चढ़ाव ज़िंदगी का कायदा है। कभी ऊँचा, कभी नीचा यही ज़िंदगी है। आदमी को हौसला रखना चाहिए। रामकिशन ने बताया था कि आपको जगह नहीं मिल रही है। एक जगह मैं ठीक करवा दूँ, मगर प्रायवेट कंपनी की नौकरी है। आप सरकारी नौकरी में दिलचस्पी रखते होंगे। ’’

‘‘ नहीं, कोई भी काम मैं कर लूँगा, पर इस शहर में नहीं करूँगा।’’

‘‘क्यों करेंगे इस शहर में। जिस जगह सिर ऊँचा करके अफ़सरी की है, वहाँ पर भले ही तनख्वा ज़्यादा हो, कम मान की जगह नहीं शोभती। आप चाहें तो एक जगह नौकरी मैं बता सकता हूँ, मगर है ज़रा दूर। ’’

‘‘ बताइए साहब, कहीं भी मैं कर लूँगा। ’’

‘‘ देखिए, वहाँ तक जाने की हिम्मत करोगे भी या नहीं। बीवी बच्चों से बहुत दूर पड़ेगा। मेरी ससुराल के लोग वहाँ है। शंभू दयाल रघुबरदयाल की फ़र्म है पूना में, सब जानते हैं। उनकी मशीनरी की फै़क्टरी है, पुर्जे ढालने, बनाने का बड़ा काम है। पाँच सौ के करीब आदमी काम कर रहे हैं। वहाँ आठ दस हजार तक की जगह मैं दिला सकूँगा। चाहें तो दस दिन में पूना आ जाइए। मैं वहाँ दस बारह दिन ठहरूँगा। पता मैं स्टेशन पर दे दूँगा।’’

‘‘ आप पूना ही जा रहे हैं ?’’

‘‘ जी हाँ।’’

‘‘ तब मैं आपके साथ ही चलूँगा। ’’

‘‘ आप इस बच्चे को घर छोड़ आइए। एक हफ़्ते में आ जाना।’’

‘‘ मैं इस बच्चे के साथ ही चलूँगा, सेठ साहब । मैं बहुत आभारी रहूँगा। ज़िंदगी भर इस अहसान को इतनी मेंहनत और ईमानदारी से बजाकर दूँगा कि भगवान ही जानेगा। ’’

‘‘ अरे अरे, इतना कहने की क्या ज़:रत है। ’’

सेठ साहब की पूना वाली फ़र्म में उसे जगह नहीं मिल सकी थी। एक बहुत बड़ा सिफारिशी व्यक्ति तीन चार दिन पहले ही लग चुका था। पाँच छह हजार की नौकरी उसने करना पसंद नहीं किया। ठहरने की व्यवस्था सेठ ने कर ही दी थी। कहा था आप अच्छी जगह आराम से ढूँढिए, बाबू साहब। जब तक चाहें, आप दोनों यहाँ आराम से रहिए, रसोई में भोजन पाइए।’’

दस ग्यारह दिन के बाद उसने बारह हज़ार रुपए माहवार की जगह ढूँढ ली थी। पूना में सदाशिव पेठ में रहने को दो कमरों का फ्लैट भी मिल गया। नीचे कमरे और लॉन भी था। बिल्डिंग के बहुत से लोगों में वह अलग सा हिस्सा था। अजय के साथ वह नए मकान में रहने चला गया। उसके तीन बाद तक सेठ साहब के यहाँ से खाने का टिफ़िन आता रहा।

ऑफ़िस घर से आठ मील दूर था। मालिक पराडकर साहब बहुत ही सज्जन और दयालु पुरुष थे। काम बहुत सख्त और अधिक था-- अकाउंट्स का काम, पत्र-व्यवहार, कोर्ट की पेशियाँ और स्टोर। चार आदमियों का काम उसे एक सहायक के साथ करना होता था। सहायक केरल के श्रीनाथन अधेड़ पुरुष थे, पर बहुत ही दक्ष थे। शीघ्र ही उसने अपना सिक्का वहाँ जमा लिया। छह महीने आराम से गुजर गए। छठे मास ही पराडकर साहब ने उसे कैश की चाबियाँ सौंपकर कहा था, ‘आगे में आपका अकाउंट्स और स्टोर का जिम्मा नहीं रहा, प्रशांत बाबू। श्रीनाथन को प्रमोशन दे रहा हूँ। आपकी टेबल पर वे बैठेंगे। आप घबरा क्यों रहे हैं यह सुनकर। प्रमोशन आपको भी मिला है। मँगवाइए कुछ मिठाई वगैरह। आज से आप असिस्टेंट मैनेजर हो गए हैं, सोलह हजार रुपए महीना पाएँगे। क्यों खुश हुए न ?’’

उसने पराडकर साहब के पैर छू लिए थे। गद्गद होकर उन्होंने कहा, ‘‘ अरे अरे, इतना पाप मत चढ़ाइए। आपका काम और निष्ठा ही श्रेय देने को है, प्रशांत बाबू।’’

न अजय ने न उसने कभी भी विगत को याद नहीं किया। अजय बहुत खुश था। पड़ोसी उसे अपने बच्चों में से एक समझते। इतना छोटा अजय इतना समझदार होगा, यह वह नहीं जानता था। अजय ने सभी से कहा था, ‘‘ मेरी मम्मी का पिछले साल देहांत हो गया। मेरी बहन व भैया दादी जी के पास पढ़ते हैं। भैया तो बहुत छोटा सा है। ’’

अपनी झूठ को उसने प्रशांत को बताकर पूछा था, ‘‘ पापा, क्या मैंने गलत किया ?’’

‘‘ नहीं बेटे, यह सच ही जानना बेटा। ऐसा ही हुआ है। दादी है धरती माँ। उन्हीं को सौंपा है हमने मिनी और संजू को। वह दादी उनकी रक्षा करेगी।’’

’’ हम संजू और मिनी दी को यहाँ कभी नहीं लाएँगे, पापा। वे दोनों मम्मी की तरफ़ के थे । मुझे बहुत तंग करते थे, चुगली करते थे, पिटवाते थे। इतने अच्छे अपने घर में हम उनमें से किसी को पैर भी नहीं रखने देंगे। उनकी कभी बात भी नहीं करेंगे। जो बात करे वह जुर्माना भरेगा, है न पापा ?’’

‘‘ शाबाश बेटे, हम किसी को अपना पता ही नहीं देंगे। कभी यहाँ वे लोग आ ही नहीं सकेंगे। ’’

‘‘ हम अपने घर को खूब बढ़िया सजाएँगे, पापा। नरम गद्देदार पलंग और सोफ़ा लाएँगे। एक टीवी भी लाइए, पापा। एक बड़ी सी घड़ी भी लाना । ’’

‘‘ जो जो तू कहेगा, वह सब ला दूँगा। बस कहना तेरा काम, लाना मेरा। ’’

‘‘ आप कितने अच्छे हो, पापा। आपके पास पैसे जब खूब होंगे तब मेरे वास्ते एक छोटी सी दो पहिए वाली साइकिल भी लाना। मँहगी हो, तो मत लाना । मैं अच्छी तरह चल लेता हूँ।’’

‘‘ अपने पास तो खूब पैसे रहते हैं रे, कल ही ला दूँगा। पहले क्यों नहीं कहा तू ने ?’’

‘‘ आप चिंता करेंगे, इसलिए नहीं कहा।’’

दूसरे दिन एक सुंदर सी छोटी साइकिल अजय को ला दी। नई जगह का चार्ज ले लेने पर काम कम हुए, जिम्मेदारी बड़ी और बार बार बंबई जाने का काम आने लगा। दो तीन दिन भी बंबई में रहना होता। अजय को अकेला छोड़ना उसे सहन नहीं होता। घर में काम करने को जो बाई लगी थी वह उसके बंबई जाने पर घर ठहर सकती थी पर अजय का मन नहीं मानता। पहली व दूसरी बार बंबई के दौरे पर वह अजय को साथ ले गया। दूसरी बार की यात्रा की वापसी पर उसी डिब्बे में बंडू की दीदी बैठी मिल गई। तीस वर्ष की आयु के लगभग सरल मन की युवती थी शोभना। अजय दौड़कर उसके पास पहुँच गया। ‘’दीदी, देखो मैं भी चल रहा हूँ।’’

शोभना शनिवार को पूना आती थी, रविवार को रहकर लौट जाती थी। शोभना से कभी प्रशांत का मिलना नहीं हुआ था। दूर से दो तीन बार देखा भर था एक दूसरे को। शोभना के पास बैठने को स्थान था। उसने निःसंकोच प्रशांत को वहाँ बुला लिया। बोली, ‘‘अजय को आप दौरे पर क्यों लाते हैं? घर पर माँ, छोटी बहन, पापा और भैया-भाभी उसे कितना प्यार करते हैं, यह आप नहीं जानते क्या? वह बड़े मज़े से मेरेघर रह सकेगा। आप इसकी ज़रा भी चिंता न किया करें।

‘‘आगे से मैं वहीं छोड़ आया करूँगा।’’

‘अरे वाह! आप तो बहुत जल्दी से सब मानने वाले आदमी नहीं हैं। थैंक्यू।’’ दोनों हँसे।

‘‘आप बंबई में क्या कर रही हैं?’’

हमारी मौसी का एक मान्टेसरी स्कूल है माटुंगा में। मैं मौसी के स्कूल में पढ़ाती हूँ। पूना की याद भड़कते ही भाग आती हूँ। आप कहाँ सर्विस करते हैं?’’

’’पराडकर इंटरप्राइज़ेज़ में हूँ।’’

’’बहुत बड़ी फ़र्म है। मैं पराडकर साहब की लड़की के साथ एम.एससी. में थी। ’’

’’आप तो बहुत पढ़ी लिखी हैं।’’

’’कुछ भी तो नहीं। एम.एससी. की डिग्री से क्या होता है। एम.एड. भी कर डाला है। रही कोरी शिक्षिका।’’

’’शिक्षिका होना कितनी सम्माननीय बात है।’’

’’होगा, पर मुझे ऊब आती है। बच्चे पूरा दिमाग खाली कर लेते हैं। पूरे बंदर होते हैं सब के सब।’’

वह फिर हँसी। हँसने से गालों में गड्ढे पड़ते थे शोभना के। वह सुंदर है, एक हद तक गर्व करने लायक सुंदरता, पर इसका भान शोभना को नहीं था| इसलिए सहज निर्विकार और औपचारिकता से दूर, निःसंकोच वह किसी से भी बोल सकती थी। अपने साथ लाई टोकरी में से उसने एक पैकेट निकाल कर खोला। अजय को मुट्ठी भर कर तले हुए काजू देकर उसने दो अपने मुँह में डालकर प्रशांत को पैकेट थमा दिया। प्रशांत ने खाना आरंभ नहीं किया, तब बोली,’’ खाइए न? बड़े मज़ेदार हैं। मैं तो पूरा पैकेट ही खा जाती हूँ कई बार। घर जाकर बंडू पूछता है कि उसकी चीज़ लाई तो झूठ बोलना पड़ता है कि याद नहीं रहा। इतना शैतान है कि सच कह देने पर वह खाना भी खाने नहीं देगा। उसे मसाला काजू बहुत पसंद है बंबई के सिर्फ़ उसी दुकान के। पूना के अच्छे से अच्छे काजू वह छूता तक नहीं। आप चालू कीजिए न। घाटे में रहना होगा नहीं तो।

सफ़र अच्छा कटा। शोभना बहुत हँसती रही। टैक्सी लेकर तीनों साथ-साथ घर पहुँचे। शोभना ने जाते हुए कहा ‘‘कल आपकी छुट्टी होगी। हमारी ओर आइए न, साथ ही सुबह का खाना खाएँगे। महाराष्ट्र का भोजन भी खाकर देखिए। आएँगे न?’’

शोभना से बढ़ा परिचय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। बंबई के दौरे पर जब भी वह जाता शोभना के स्कूल में फ़ोन कर देता। शोभना उसे आने को कहती। फिर शोभना की मौसी वहीं ठहर जाने को कहतीं। वहीं खाना-सोना होता। घूमने भी जाया करते। कभी भी दोनों के बीच नितांत अकेले होने पर भी भद्रता की सीमा में प्रेम-प्रणय की बातें नहीं हुईं। एक दूसरे की निजी बातों को मन के दबे छुपे भावों को दोनों में से एक भी प्रकट नहीं कर पाया। प्रशांत करता भी कैसे। शोभना उसके जीवन में कैसे आ सकेगी ? वह भी शोभना का सरल, उन्मुक्त, सहज जीवन अपने विगत से गँदला नहीं करेगा।

दो मास तक उसका बंबई जाना नहीं हो पाया। पूना आए सवा साल हो चुका था। कभी कभी उसे राजश्री और बच्चों के बारे में जानने की जिज्ञासा होती। शोभना इन दो महीनों में एक बार ही पूना आई और दो दिन न जाने कहाँ कहाँ बाजार हाट में व्यस्त रहकर चली भी गई । मिलना-बोलना भी नहीं हो सका।

सहसा एक साथ कई बातें घटीं। ऑफिस के एक क्लर्क ने कानपुर जाने के लिए उससे एक सप्ताह की छुट्टी माँगी। कानपुर के रहने वाले हैं, जानकर प्रशांत को आश्चर्य हुआ। उमेंश चंद्र बारह वर्ष से पराडकर इंटरप्राइज़़ेज़ में कार्य रत था। प्रशांत ने पूछ लिया, ‘‘कानुपर में कहाँ रहते हो, उमेंश चंद्र जी।’’

‘‘जी कलेक्टर गंज में, पोस्ट ऑफिस के सामने ही घर है। यहाँ से जाना होता नहीं। पाँच साल बाद घर जा रहा हूँ। बहिन ने बहुत बुलाया है इस बार। छह महीने पहले उसके विवाह में भी नहीं जा सका था। बरेली से वह कानपुर आई है । बहुत बुलाया है। बरेली भी बुलाती रही, पर आप जानते हैं कौन इतनी दूर जाए। लंबे सफ़र से मुझे डर लगता है। बहनोई को देखा तक नहीं मैंने। ’’

यूँ ही पूछ लिया प्रशांत ने,’’बहनोई साहब क्या करते हैं?

‘‘प्रोफ़ेसर हैं। समाजशास्त्र के रीडर हैं। बड़े अच्छे आदमी हैं। पहले कानपुर में ही लेक्चरर थे। हमारे घर आना-जाना रहा है। बहिन को पढ़ाया भी है । राजेंद्र कुमार सिन्हा उनका नाम है। श्रीनाथन साहब कह रहे थे कि आप भी कानपुर रह चुके हैं। शायद राजेंद्र कुमार सिन्हा को जानते हों।’’

प्रशांत के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं उनको क्या, उनके इतिहास को भी जानता हूँ।‘‘

‘‘ मैं समझा नहीं, आपने क्या कहा|” उमेंश ने कहा ।

प्रशांत कह तो गया, पर एकदम हड़बड़ा गया। अपने को सँभालकर बोला,‘‘ कुछ भी नहीं, मैं तो मज़ाक कर रहा था।‘‘

उमेंश प्रशांत को नमस्कार कर चला गया।

उमेंश की सूचना ने प्रशांत को उद्वेलित कर दिया। उसका काम करने में मन नहीं लग रहा था। इसलिए ऑफिस से छुट्टी लेकर घर चला गया। घर आकर चाय बनाई और सोफ़े पर बैठकर विगत में पहुँच गया। अतीत की घटनाएँ फ़िल्म की रील की तरह उसके सामने आने लगीं। मेरी नौकरी छूटने तक हम एक दूसरे को कितना प्यार करते थे। प्यार के मोहक क्षण और घटनाएँ एक के बाद एक सजीव हो उठीं। मेरी बेकारी ने राजश्री को तोड़ दिया था। उसके बाद आनंद के आने पर तो संबंध विच्छेद की नौबत आ गई। मेरेजीवन की त्रासदी के दो ही कारक थे-- मेरी नौकरी का न होना और हमारे जीवन में राजेंद्र का प्रवेश। अब तो दोनों फैक्टर नहीं रहे| मेरी अच्छी-खासी नौकरी है और राजेंद्र भी राजश्री के जीवन से चला गया। अगर मैं वापस चला जाऊँ, तो क्या राजश्री के साथ मेरा जीवन पुनः पटरी पर चलने लगेगा। क्या राजश्री की दुश्चरित्रता को माफ़ किया जा सकता है। स्त्रियाँ तो अक्सर अपने पतियों के दुश्चरित्र को माफ़ कर देती हैं, तो क्या पुरुष होकर मैं इतना साहस नहीं जुटा सकता। उसे लगा कि वह एक दोराहे पर खड़ा है, किधर जाए, यह तय नहीं कर पा रहा है। सवाल हम दोनों का ही नहीं है, बच्चों के भविष्य का भी है। बच्चे तो मेरेऔर राजश्री के ही हैं, राजेंद्र के नहीं। फिर वह क्यों उनकी चिंता करेगा। वह तो क्षणिक :प से भ्रमर की भांति राजश्री के यौवन की ओर आकर्षित हुआ था। मुझे एक बार कानपुर जाकर स्थिति का जायज़ा लेना चाहिए। अंतिम निर्णय बाद में भी लिया जा सकता है। इतने में अजय के आने की खटपट सुनाई दी।

अजय को नाश्ता देकर उसने अजय का मन टटोलना चाहा, ‘अजय बेटा, क्या तुमहें अपनी मम्मी और अपने भाई बहिन की याद नहीं आती ?‘‘

अजय ने गंभीर होकर कहा, ‘‘आती तो है, पर राजेंद्र भाई साहब की प्रताड़ना पर मम्मी का खामोश रहना बड़ा ही दिल दहलाने वाला था ।‘‘

‘‘अब तो राजेंद्र वहाँ नहीं रहता, तब क्या मम्मी के पास जाना पसंद करोगे?‘‘

उसके बाद कुछ देर अजय खामोश रहा, फिर बोला, ‘‘जैसा आप चाहें‘‘।

‘‘ तो ठीक है। हम लोग परसों बुधवार को कानपुर चलेंगे। कल मैं अपने ऑफिस से छुट्टी ले लूँगा और तुम भी अपने स्कूल से एक सप्ताह की छुट्टी ले लेना। हाँ, पढ़ने के लिए कुछ पस्तकें रख लेना।‘‘

शाम 7 बजे अचानक शोभना प्रकट हो गई। प्रशंत ने उसे ड्राइंग :म में बैठा दिया। शोभना को देखते ही अजय उससे लिपट गया और बोला, ‘‘आन्टी आप तो हमारे घर आती ही नहीं हो।‘‘

शोभना ने अजय के गालों को थपथपाते हुए कहा, ‘‘ मैं नहीं आती तो क्या हुआ, तुम तो रोज़ खेलने के लिए मेरेघर आ जाते हो न।‘‘

‘‘ आप भी आया करो न।‘‘

‘‘ तुम बुलाते ही कहाँ हो, फिर मैं कैसे आऊँ ?‘‘ यह कहकर शोभना खिलखिलाकर हँस पड़ी।

अजय ने बड़ी मासूमियत से कहा ‘‘ पापा, शोभना आन्टी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं, आप बुलाया कीजिए न।‘‘

प्रशांत के मुँह से अनायास निकल गया, ‘‘ अच्छी तो मुझे भी लगती हैं। पर संकोच होता है कि बुलाऊँ कैसे।‘‘

इतना कहकर प्रशांत ने शोभना की ओर देखा। शोभना बुरी तरह शरमा गई थी। कुछ क्षण बॉडी लैंग्वेज से भावों का आदान प्रदान हुआ। चुप्पी को प्रशांत ने तोड़ा, ‘‘ आप पहली बार मेरेघर आई हैं। मैं आपको चाय बनाकर लाता हूँ।‘‘

‘‘ मैं आपकी चाय ज़:र पीती क्योंकि सुना है कि आप चाय बहुत अच्छी बनाते हैं। लेकिन इस समय मैं बहुत जल्दी में हूँ। फिर कभी।‘‘

‘‘ अच्छा यह बताइए कि आपका आना कैसे हुआ?‘‘

‘‘मुझे कई जगह निमंत्रणपत्र बाँटने हैं। यह काम मुझे आज ही निबटाना है। पापा बाहर गए हुए हैं। इसलिए यह काम मुझे ही करना पड़ रहा है।‘‘ एक निमंत्रणपत्र प्रशांत को पकड़ाते हुए उसने कहा।

‘‘ यह किस बात का निमंत्रणपत्र है ?‘‘

‘‘इस रविवार को मेरा जन्मदिन है।‘‘

‘‘ वैसे तो यह प्रश्न महिलाओं से पूछा नहीं जाता। फिर भी आप चाहें तो बता दीजिए कि कौन सा जन्मदिन है।‘‘

‘‘आपसे क्या छुपाना। यह मेरा तीसवाँ बर्थडे है। अजय को लेकर आप अवश्य आइए।‘‘

‘‘क्या मुझमें कोई खास बात है?‘‘ प्रशांत ने शरारती मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

शोभना ने भी शरारती मुस्कान बिखेरते हुए उत्तर दिया, ‘‘यदि खास बात न होती, तो क्या मैं स्वयं रात को निमंत्रणपत्र देने आती।‘‘ इतना कहकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। जो बात सैकड़ों शब्दों में नहीं कही जा सकती वह दोनों के हावभाव से प्रकट हो गई।

जाते-जाते शोभना ने कहा, ‘‘ आप आएँगे न !‘‘

शांत ने भी कह दिया, ‘‘ आपने कहा और हम न आएँ, ऐसा कैसे हो सकता है?‘‘

तभी अजय बीच में ही बोल बैठा, ‘‘पापा, हम लोग परसों कानपुर जा रहे हैं, फिर हम लोग आन्टी कि बर्थडे में कैसे जा पाएँगे?‘‘

‘‘ क्या आप कानपुर जा रहे हैं? आपने बताया नहीं ।‘‘

‘‘ जाने की सोच तो रहा था। पर अब बाद में जाऊँगा|” प्रशांत ने कहा।

यह सुनकर अजय ताली बजा-बजाकर और कूद-कूदकर कहने लगा, ‘‘ हम कानपुर नहीं जाएँगे, आन्टी के बर्थडे में जाएँगे।‘‘

प्रशांत ने अजय से पूछा, ‘‘ क्या शोभना आन्टी तुम्हें बहुत अच्छी लगती हैं?‘‘

‘‘हाँ पापा।‘‘

इतना सुनकर शोभना शरमा गई और चलती बनी।

रात को जब प्रशांत सोने लगा, तब उसे बार बार शोभना की मुस्कान और हाव-भाव याद आने लगे। क्या शोभना मुझसे प्यार करने लगी है। अजय के होते हुए क्या वह मुझसे शादी कर लेगी। क्या उसको सच बता दिया जाए, तो भी। राजश्री का तिरस्कृत व्यवहार उसे शोभना के प्रति और आकर्षित करने लगा। उसे लगा कि वह एक दोराहे पर खड़ा है। किधर जाए समझ नहीं पा रहा था। शोभना एक पढ़ी लिखी और समझदार महिला है। वह अच्छी मित्र भी हो सकती है और एक अच्छी पत्नी भी। उसके जन्मदिन के बाद क्यों न अपना सब सच बता दिया जाए। उसके बाद वह जो निर्णय ले, वही मेरेलिए श्रेष्ठ होगा।‘ यही सोचते सोचते प्रशांत सो गया एक नई सुबह के इंतज़ार में।

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