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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



रहस्य


प्रेम एस. गुर्जर


दुनिया के इतिहास में अभी तक हड़प्पा सभ्यता की लिपि को नहीं पढ़ा जा सका है। आख़िर क्या कहना चाहते थे सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग? कुछ तो संदेश हम लोगों को देना चाहते थे। इसी प्रयास में लगे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रो. विजय सिंह के हाथ कुछ ऐसा लगा कि वे उछल पड़े, मारे ख़ुशी के झूमने लगे। घड़ी में देखा शाम के 6 बजे थे। कैम्पस में सन्नाटा ही सन्नाटे को मात दे रहा था। तभी अचानक उनके बेसिक फोन की घण्टी बजी। उठाया तो अंदर से आवाज़ आयी "प्रोफ़ेसर तुम जो काम कर रहे हो उसे तुरन्त बन्द करो वरना...."। इससे पहले कि प्रोफ़ेसर कुछ बोलते फोन कट चुका था। आख़िर कौन हो सकता है जो मुझे रोकना चाहता है।

जल्दी से प्रोफ़ेसर ने अपना ऑफ़िस बंद किया और तेज़-तेज़ क़दमों से बाहर की ओर चलने लगे। उनके स्वयं के क़दमों की आवाज़ ही उनकी धड़कनें बढ़ा रही थी। मन ही मन सोचते हुए जा रहे थे कि मुझे रहस्य का पता चल गया। क्या सच में ऐसा संभव हो सकता? आख़िर उस रहस्यमयी मुहर तक पहुँचना है मुझे। कुछ इसी प्रकार के ख़यालों में अपनी ही धुन में प्रोफ़ेसर साहब विश्वविद्यालय के गेट से बाहर निकले ही थे कि इतने में तीन स्कार्पियों कारों ने उनका रास्ता रोका। इससे पहले कि प्रोफ़ेसर चिल्लाते उनमें से तीन-चार व्यक्ति उतरे एवं जबरन उनको अन्दर बिठाकर चल पड़े और किसी सुनसान जगह प्राचीन खण्डहर में लाकर पटक दिया। प्रोफ़ेसर इतने बलिष्ट भी नहीं थे कि सभी से मुक़ाबला कर सकें। कुछ लोग उनके आस-पास मुस्तैद थे। उन सभी का मुँह किसी काले कपड़े से ढका हुआ था सिर्फ़ आँखें ही दिखायी दे रही थीं। ऐसे में उनको पहचानने की कोशिश व्यर्थ थी। आख़िर ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या आज ही इनको ये सब करना था? जब कि अभी-अभी मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य खोज निकाला था। मेरी तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी। इतने में उनका सभी का मुखिया सामने आया। उसके चेहरे पर भी काला कपड़ा बंधा था। हाँ बाहर से देखने में वह क़द में काफ़ी लम्बा, बॉडी सलमान खान की तरह एवं शरीर का रंग थोड़ा काला था। विजय सिंह सोचने लगे "ये गुण्डे इतने ताक़तवर और प्रोफ़ेसर इतने कमज़ोर क्यों होते हैं? मैंने आज तक किसी पहलवान प्रोफ़ेसर को नहीं देखा। क्या मुझे भी अखाड़े जाना चाहिए था? कुछ इसी तरह के ख़यालों में खोये हुए थे प्रोफ़ेसर सिंह कि इतने में मुखिया पास आया।

"ओय प्रोफ़ेसर ...तोहारे जो रिसर्च महार आर्यों पर किया वाको तुरते ही वापिस लो। वरना तोहार जान गयी। जल्दी ही अपना पक्षवा मिडिया औरन पत्रकारनवा के यीहाँ धर दो कि ये ससुरा आर्यनवा विदेशी नहीं बल्कि यीहा भारतीयन ही थे।" उसने प्रोफ़ेसर के मुँह के पास आकर रोबदार आवाज़ में कहा। "प्रोफ़ेसर ई बात अच्छे से समझ लो हमारी पहचान पर अगर ज़रा सी आंचनवा आयी तो तोहारे को छोडे़ंगे नाही।"

प्रोफ़ेसर के अब कुछ कुछ समझ आ रहा था कि बात क्या है?

"माफ करना भाई साहब किन्तु आर्यों के भारत आगमन वाली बात को तो 6 महिने से ऊपर हो गये। आप किसी को इस तरह नहीं मनवा सकते इतिहास जो सही है उसको कितने दिन छिपाओगे। ज़ोर ज़बरदस्ती से क...ब... त... क... किसी...को...," प्रोफ़ेसर आगे भी कुछ बोलना चाहते थे किन्तु उस व्यक्ति ने उनका गला ज़ोर से दबा दिया। अब प्रोफ़ेसर साहब को साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। अब वह मर जायेंगे। ऐसे लोग किसी पर दया नहीं करते। उन्होंने आईएसआईएस के आतंकवादियों के विडियों वाट्सऐप पर देख रखे थे। अब तो गये काम से। आर्यों के आगमन ने तो मरवा दिया। कम से कम एक चाय पिलाकर तो गला दबाते। प्रोफ़ेसर को चाय का बहुत ही शौक़ था। एक बार आख़िरी ख़्वाहिश तो पूछते। विजय सिंह कुछ इसी प्रकार के विचारों से सामना कर रहे थे कि इतने में उसने गला छोड़ दिया। जान में जान आयी। बच गये!

"ऐ....प्रोफ़ेसरवा... ज़्यादा ज्ञान मत पिला वरना ...ईयांस इसी जगह ससुरे तीन-तीन को एकन गोली से मारा है। हा....हा...हा...हा....साला आया इतिहास का ज्ञान देने," उसने इसे कुछ फ़िल्मी, कुछ रजनीकांत के अंदाज़ में कहा।

"ठीक... है... ठीक ....है... जैसा आप चाहते हो वैसा ही होगा," प्रोफ़ेसर ने पिण्ड छुड़ाने के लिए हाँ में हाँ मिलायी।

पिछले दिनों प्रोफ़ेसर सिंह का एक आर्टिकल "आर्य एवं उनका मूल निवास" नाम से ‘द हिन्दु’ न्यूज़ पेपर में प्रकाशित हुआ था। प्रोफ़ेसर विजय सिंह ने यह साबित कर दिया था कि आर्यों का मूल निवास स्थान भारत नहीं बल्कि दक्षिणी यूराल पर्वत के आस-पास था। जिससे कुछ कट्टरतावादी नाख़ुश थे। कुछ प्रतिक्रियावादी लोगों ने इसका तीव्र विरोध भी किया किन्तु मामला यहाँ तक पहुँच जायेगा नहीं सोचा था। इस बात को 6 महिने से ऊपर हो गये थे। आख़िर ये गुण्डाभाई इतना लेट कैसे? ख़ैर, जो भी हो ऐसे समय में उचित यही था कि विजय सिंह उनकी बात मानकर चुपचाप निकल ले।

बहरहाल उसने प्रोफ़ेसर सिंह को वापिस दिल्ली अपने कैम्पस के पास लाकर छोड दिया। प्रोफ़ेसर मन में सोचने लगे आख़िर कैसे लोग हैं? कहाँ की डैमोक्रेसी? यहाँ पर तो कुछ नया सोचना ही गुनाह है। प्रोफ़ेसर सिंह जेएनयू के जाने-माने इतिहासकार थे। उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास जिसमें भी सिन्धु घाटी सभ्यता के संदर्भ में विशेष कार्य किया है।

इस समय रात के तकरीबन 8 बज चुके थे। हवा कुछ मायूस कुछ मुरझाये से बच्चे के समान चल रही थी। आसमान साफ़ था पर प्रोफ़ेसर सिंह का मन विचलन से भरा हुआ था। कितना मुश्किल है जीवन में तन और मन दोनों हर समय एक साथ रहें। विजय सिंह का तन तो घर पर था, पर मन किसी अनिष्ट के होने के आशंका से विचलन भरे वैराग्य से युक्त था। इंसान भी क्या अजब प्राणी है क्या अनोखी देन है उस परमात्मा की। हमने पूरे ब्रह्माण्ड को समझ लिया पर स्वयं को नहीं समझ पाये। कहते हैं आपके विचार परिस्थितियों का निर्माण करते हैं किन्तु जब परिस्थितियाँ ऐसी जटिल बन जायें तो विचार अपना आदर्श छोड़ देते हैं।

प्रोफ़ेसर ने एक बार तो सोचा कि पुलिस में अभी इत्तला कर दें पर अभी इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण कार्य करना था। इस सदी का एक महान रहस्य सामने आने वाला था। घर पहुँचकर जेब में हाथ डाला तो देखा वह डायरी ग़ायब थी जिस पर सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के कुछ रहस्यात्मक संकेत लिखे थे।

धत् तेरी की ...हो गया कबाड़ा...अब क्या करूँ...?

उस डायरी में बहुत ही महत्वपूर्ण संकेत छुपे थे। प्रोफ़ेसर के जीवन भर की रिसर्च का सार था, आज जिस निष्कर्ष पर पहुँचे थे वह भी उसी में लिखा था। कोई उनके रिसर्च में इतनी रुची क्यों लेगा? क्या वाकई वह उस रहस्य तक पहुँच जायेगा...ग़ज़ब हो जायेगा...पूरी सभ्यता का रहस्य समाप्त हो जायेगा...प्रोफ़ेसर भगते हुए से सीधे विश्वविद्यालय ऑफिस पहुँचे। सोचा कही जल्दी जल्दी में डायरी ऑफिस ही तो नहीं भुल आये पर वहाँ कुछ नहीं मिला। शायद उन लोगों ने निकाल ली किन्तु वह तो आर्य आगमन के सम्बन्ध में थे...नहीं...नहीं...वे...मूर्ख बना रहे थे...। ज़रूर डायरी चुराना उनका ही काम है। वह मेरा रहस्य...ओह...नो...। उन्होंने मेरा ध्यान आर्य आगमन की तरफ़ मोड़ कर बडी कुशलता से यह कारीगरी कर दी ताकि मैं उनके ख़िलाफ़ कोई कम्प्लेन वगैरह करूँ तब तक उनका काम हो जायेगा। वे उस रहस्यमयी मुहर को चुरा ले गये तो मेरी जीवन भर की मेहनत गई काम से। अब क्या करें क्या नहीं के भाव में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रोफ़ेसर वही धम्म से बैठ गये। सोचने लगे इंसान पका-पकाया खाने में कितना तत्पर रहता है। यूनिवर्सल बेसिक इनकम का कॉन्सेप्ट इसी का तो नतीजा है। अमरीकी मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स ने कहा था कि आपके अवचेतन मन में दुनिया को हिलाने की शक्ति है। फिर इंसान क्यों नहीं अपनी शक्ति को पहचानता? क्यों दुसरों के विचार व वस्तएँ चुराने में लगा रहता है? यहाँ पर कोई प्रयास करना नहीं चाहता सबको सीधा मिल जाये तो ख़ुश। पर साथ ही हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि यहाँ कोई किसी की नहीं सुनता। अगर लोग ढंग से सुन लेते तो एक विचारक ही काफ़ी था। बेचारे इतने विचारकों को पैदा होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

बहरहाल वे चोर जो भी हों उस रहस्यमयी मुहर को चुराने गये होंगे। इसी विचार से प्रोफ़ेसर सीधे कार लेकर नेशनल म्यूज़ियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री, नई दिल्ली की तरफ़ रवाना हो गये जहाँ उस रहस्यमयी मुहर समेत सभी सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरें रखी थीं। रास्ता ज़्यादा लम्बा नहीं था किन्तु आशंकाएँ हमेशा वक़्त काटना मुश्किल कर देती हैं। जीवन में हम जो पाना चाहते हैं उसके नज़दीक पहुँचने पर उसके खोने का डर भी उतना ही बढ़ जाता है। प्रोफ़ेसर को कुछ नहीं सूझ रहा था। उस एक मुहर से पूरी सिंधु घाटी सभ्यता का राज़ खुलने वाला था। उस मुहर के पीछे लिखे संकेतों से वे उस गुप्त रहस्य हो ढूँढने के दो क़दम ही दूर थे। प्रोफ़ेसर की कार म्यूज़ियम से लगभग 600 मीटर ही दूर होगी कि चारों तरफ़ से उनको पुलिस ने घेर लिया। वे समझ नहीं पा रहे थे कि माजरा क्या है? उसमें से एक दिल्ली पुलिस का अधिकारी तेज़-तेज़ क़दमों से प्रोफ़ेसर विजय सिंह के पास आकर बोला -

"प्रोफ़ेसर साहब आपको म्यूज़ियम में चोरी करवाने के आरोप में अरेस्ट किया जाता है।" उसने अपने हाथ में प्रोफ़ेसर साहब की डायरी दिखाते हुए कहा। "ये आपकी गिरफ़्तारी का सबूत आपकी हस्तलिखित डायरी जिसमें आपने हड़प्पाकालीन कोई मुहर म्यूज़ियम से लाने का लिखा है इसके नीचे आपके हस्ताक्षर भी हैं और ये आपकी स्वयं की लिखावट है।" पूरे आत्मविश्वास से वह बोले जा रहा था, "मेरे ख़याल से ये सबूत आपकी गिरफ़्तारी के लिए काफ़ी होंगे प्रोफ़ेसर साहब।"

धत् तेरी की...चोर ...रहस्यमयी... मुहर ...ले गये। पीछे छोड़ गये मेरी डायरी...नामुराद कहीं के। सब कबाड़ा हो गया। प्रोफ़ेसर सारा वाकया समझ गये। विजय सिंह को गिरफ़्तार होने की उतनी चिंता नहीं जितनी उस मुहर के चोरी होने की थी। उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर निशांत को फोन लगाया। निशांत एवं विजय सिंह दोनों सहपाठी थे। निशांत के कहने पर पुलिस वाले प्रोफ़ेसर साहब को सीधे कमिश्नर निवास ले आये।

निशांत और प्रोफ़ेसर सिंह दोनों किसी समय साथ में मुखर्जीनगर में आईएएस की तैयारी करते थे। दोनों का मुख्य परीक्षा के लिए वैकल्पिक विषय इतिहास था। निशांत का चयन तो आईपीएस के पद पर हो गया किन्तु विजय सिंह का उस परीक्षा में नहीं हुआ। कालान्तर में उनका जेएनयू में इतिहास के प्रोफ़ेसर के पद पर चयन हो गया। इस बात का विजय सिंह को ज़रा सा भी इल्म नहीं था कि उनका आईएएस में नहीं हुआ बल्कि वे अपनी जगह ख़ुश थे। हम जीवन में कोशिश करते हैं तो उस मुकाम तक या उसके स्तर तक ज़रूर पहुँच जाते हैं बस ज़रूरत कोशिश करने की होती। विजय सिंह का इतिहास प्रेम उनको यहाँ तक ले आया। इसी जुनून के चलते प्रोफ़ेसर विजय सिंह ने कई इतिहास की पुस्तकें, कई शोध पत्र आदि प्रकाशित करवाये थे।

रात के 9 बज चुके थे। हवा का रुख अभी भी रूखा-रूखा सा था। निशांत के घर पहुँचकर विजय सिंह ने सारा घटनाक्रम बयां किया। उसका पहला सवाल यही था कि "विजय आख़िर तुमने किस रहस्य की खोज की और वो लोग तुमसे इसे क्यों ले गये? और वह रहस्यमयी मुहर क्या है?" निशांत ने गम्भीरता से पूछा।

"दरअसल बात यह है कि हड़प्पा की लिपि संकेतात्मक पहेली की तरह है। हर एक संकेत एक पहेली की तरफ़ इशारा करता है।" प्रोफ़ेसर की बात पूरी होने से पहले ही निशान्त उत्सुकता से बोले, "किन्तु वे चिह्न तो भाव चित्रात्मक है।"

"हाँ अभी तक यही हमारी मान्यता थी किन्तु ऐसा नहीं हैं। ये सभी चिह्न किसी एक रहस्यमयी मुहर की तरफ़ संकेत कर रहे हैं।" प्रोफ़ेसर साहब का वाक्य पूरा होते ही निशान्त ने पीछे खडे पुलिस के सिपाही को दो चाय लाने का इशारा किया। निशांत जानता था विजय को चाय का ज़्यादा शौक़ था।

"तुम कहना क्या चाहते हो?" निशान्त ने स्पष्ट करने को कहा।

"तुम इतना तो जानते हो कि इन्द्र के नेतृत्व में 1500-1600 ई.पू. आर्यों ने सिन्धु सभ्यता पर भीषण आक्रमण किये थे। इन आक्रमणों के डर से सैंधव लोगों ने अपनी सारी धरोहर, सोना, साहित्य सब के सब किसी गुप्त रहस्यात्मक स्थान पर छिपा दिये। पीछे कुछ पहेलीनुमा संकेत छोड़ दिये ताकि कुछ वर्षों बाद जब आर्य वापिस चले जायें तो खज़ाना पुनः प्राप्त कर सकें। इन पहेलियों को आर्य नहीं पढ़ पाये एवं वह संपति व सोना किसी गुप्त स्थान में सुरक्षित रहे। कालान्तर में आर्यों ने यहाँ स्थायी जीवन प्रारम्भ कर लिया। इतिहास गवाह है कि आर्यों को सैंधव सभ्यता के निवासियों से कुछ भी नहीं मिला, ना दौलत ना सोना चाँदी। इससे खिन्न होकर आर्यों ने पूरी सैंधव सभ्यता को तहस-नहस कर दिया था। प्राचीन भारत के सभी इतिहासकार इस बात को एकमत से स्वीकारते हैं कि जब आर्यो को यहाँ कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो उन्होंने गंगा यमुना दो-आब की तरफ़ रुख किया तथा वहाँ ग्रामीण जीवन व्यतीत करने लगे।" निशांत प्रोफ़ेसर की बात अवाक् सा सुन रहा था। प्रोफ़ेसर की बात पूरी हुई ही थी कि चाय आ गयी। दोनों चाय पीते हुए वार्तालाप करने लगे।

"मान लें कि पतन का कारण केवल आर्य थे तो ये लिपि व खज़ाने वाली बात कैसे साबित होती है? ऐसा तो किसी इतिहासकार ने नहीं कहा," निशांत ने चाय पीते हुए कहा।

प्रोफ़ेसर लैपटॉप पर गूगल इमेज पर सिंधु सभ्यता के अवशेष दिखाते हुए बोले- "इसी बात पर तो मैंने इतने दिनों रिसर्च की अब तुम ध्यान से देखो इस पूरी सभ्यता में जितने भी संकेत मिले उनमें सभी में तीन की संख्या कॉमन है।" प्रोफ़ेसर ने निशांत को लैपटॉप में इशारा करते हुआ कहा, " उस कुबड़ वाले साँड की मुहर को देखो इसके ऊपर तीन खड़ी पाई के चिह्न का एक वर्ण उत्कीर्ण है। यह किसी विशेष मुहर की ओर संकेत कर रहा है जिसका सम्बन्ध तीन की संख्या से है। ये तीन मुख वाला जानवर, तीन मुख वाला पौधा, दो बाघ के मध्य दोनों हाथ लम्बे किये खड़ा मनुष्य यह भी तीन का संकेत है, मोहनजोदड़ो से प्राप्त विश्व प्रसिद्ध कांसे की नर्तकी के गले में तिमणिया माला भी किसी तीन की ओर संकेत कर रही है। यहीं से मिले योगी की शोल पर बने त्रिफलक भी उसी ओर इशारा है। ये सभी किसी रहस्यमयी मुहर की तरफ़ इशारा कर रहे पहेलीनुमा संकेत हैं।"

प्रोफ़ेसर की भारी भरकम बातें शायद निशांत के ऊपर से निकल रही थीं। पास में बैठा कुत्ता उठ कर बाहर की ओर चला गया। शायद वो भी बोर हो रहा था।

"तो आख़िर वो रहस्यमयी मुहर कौन सी है? जिस तरफ़ ये संकेत है," निशांत ने कहा।

"वो रहस्यमयी मुहर यहाँ से मिली पशुपति शिव की मुहर है। इस मुहर को ध्यान से देखो इसमें तीन तीन के समूह में कुल 6 अक्षर, तीन तीन के समूह में 6 जानवर और इन सब के मध्य तीन सींग धारी एक व्यक्ति तपस्यारत है। इसे ही इतिहासकार जान मार्शल ने ‘आद्य शिव’ की संज्ञा दी थी।" निशांत पर प्रोफ़ेसर की बातों का प्रभाव जमता जा रहा था। वह उत्सुकता से सुनता जा रहा था।

"इससे यह तो साबित हो गया कि रहस्यमयी मुहर यही है। किन्तु मेरे सामने बड़ी चुनौती यह थी कि आख़िर इस मुहर पर लिखा क्या है? मोहनजोदड़ो नगर से मिली इस मुहर के ऊपर कुल 6 अक्षर लिखे हैं जिनको मैं पिछले कई महिनों से पढ़ने का प्रयास कर रहा था। किन्तु आज शाम को छह बजे अचानक मुझे सफलता मिली और इनको सही-सही पढ़ पाया। इन 6 अक्षरों का आशय इस प्रकार है -

"मुहर मिलेगी दीजिए रहस्य पीछे ध्यान" प्रोफ़ेसर की बात पूरी हुई ही थी कि निशांत बोल उठा "अब इसका क्या मतलब हुआ?"

"जब मैंने इनको सही सार्थक क्रम में रखा तो कुछ इस प्रकार वाक्य बना -

"ध्यान दीजिए मिलेगा रहस्य मुहर पीछे"

प्रोफ़ेसर की पूरी बात सुन निशांत के चेहरे के हाव भाव उड़ से गये थे। 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ी खोज होने वाली थी। इस रहस्य से पर्दा उठ जाता तो हम इस सभ्यता को अच्छे से समझ पाते। संभव था इसका दार्शनिक पक्ष मिश्र, मेसोपोटामिया, रोम व यूनान की सभ्यता को भी पीछे छोड़ता। पर अब क्या हो सकता था। अब कुछ नहीं हो सकता रहस्य भी गया और मुहर भी गयी। जिसके पीछे उस रहस्यात्मक गुप्त स्थान का पता लिखा था। प्रोफ़ेसर उदास होकर धम्म से बैठ गये। जीवन भर हम जिस मंज़िल के पीछे भागते फिरते अंत में जब हमें ज्ञात होता है कि हाथ कुछ नहीं आया तो कितनी निराशा होती है। ये केवल प्रोफ़ेसर ही इस वक़्त बेहतर समझ सकते थे। निशांत भी उदास हो गया। उसको भी इतिहास से काफ़ी लगाव था। हम सभी को अपने इतिहास से लगाव होता है।

चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था। घड़ी में रात के 10 बज चुके थे। अचानक कमिश्नर साहब के मोबाईल पर घण्टी बजी उन्होंने कॉल रिसिव किया - "सर मैं नई दिल्ली थाना प्रभारी दलपत सिंह बोल रहा हूँ। जिस म्यूज़ियम में चोर घुसे थे उसकी सीसी टीवी फुटेज मिल गयी। उसको देखने से स्पष्ट हुआ की चोर किसी विशिष्ट वस्तु को ढूँढ रहे थे। जो शायद उनको नहीं मिली। वे बिना चारी किये लौट गये। हालाँकि हम उनको पहचान नहीं पाये क्योंकि उन्होंने काले कपड़े का नक़ाब पहन रखा था पर जाँच जारी है," निशान्त एक दम से उठ खड़ा हुआ।

"क्या चोर कुछ नहीं ले गये?"

"हाँ सर!"

"तो फिर वो मुहर... मेरी म्यूज़ियम प्रभारी से अभी बात कराओ," निशान्त ने फोन चालू रखा, दलपत सिंह ने पास ही खड़े म्यूज़ियम प्रभारी को फोन दिया।

"यस सर, मैं म्यूज़ियम प्रभारी आर.के. त्रिपाठी बोल रहा हूँ," फोन से आवाज़ आयी।

"त्रिपाठी जी आपके म्यूज़ियम के अन्दर जो सिन्धु घाटी सभ्यता की मुहरें रखी गयी थीं वे कहाँ है?" निशान्त ने पूछा।

"सर वे तो कल से राष्ट्रपति भवन तीन दिन की प्रदर्शनी हेतु गयी हुई है," त्रिपाठी ने पूरे आत्मविश्वास से सधे एवं शांत स्वर में जवाब दिया।

"क्या...?" फोन काटते हुए निशांत उछल पड़ा। साथ में प्रोफ़ेसर भी उत्सुकता से उठ खड़े हुए। निशांत ने कहा, "यार विजय वो मुहरें तो कल प्रदर्शनी हेतु महामहिम के यहाँ गयी हुई है।"

प्रोफ़ेसर की जान में जान आयी। निशांत ने राष्ट्रपति भवन कार्यलय के सुरक्षा इन्चार्ज को फोन लगाया -

"जय हिन्द सर..., सुरक्षा प्रमुख पी.के. मिश्रा बोल रहा हूँ," फोन से आवाज़ आयी।

"जय हिन्द..., मैं पुलिस कमिश्नर निशांत बोल रहा हूँ, मिश्रा जी आपके अधीन तीन दिवसीय प्रदर्शनी हेतु दिल्ली म्यूज़ियम से कुछ प्राचीन मुहरें आयीं थीं। क्या वे सभी सुरक्षित हैं?" निशांत ने एक श्वांस में पूछा।

"जी सर वे सभी सुरक्षित हैं और मैं उनके पास ही खाड़ा हूँ," मिश्रा ने कहा।

"ज़रा देख कर बताना उनमें पशुपति शिव की तीन सींग वाली मुहर है क्या? और उसके पीछे भी कुछ उत्कीर्ण है क्या?" निशांत तसल्ली करना चाह रहा था।

सिपाही ने फोन चालू रखा, इत्मिनान से देख कर जवाब दिया - "जी हाँ सर मुहर सुरक्षित है और पीछे छोटे अक्षरों में कुछ लिखा तो है कोई रहस्यात्मक लिपि लग रही है और नीचे एक छोटे नक़्शे की तरह कुछ दिख रहा है।" "हम अभी आये तब तक आप वहीं उसके पास मुस्तैद रहियेगा। जय हिन्द," निशांत ने मुस्कुराते हुए मिश्रा जी को कहा और फोन रख कर ज़ोर से चिल्लाने लगा - "यार...मेरे दोस्त विजय ...तुम्हारी खोज एक दम सही है...और वह मुहर भी सुरक्षित है....साथ में रहस्य भी।"

निशांत एवं प्रोफ़ेसर ख़ुशी के मारे कूद पड़े। दोनों कार की तरफ़ भागे...। जीवन में सच्चे मन से कोई भी चीज़ चाहो फिर अपनी चाहत पर दृढ़ विश्वास करो सफलता निश्चित ही मिलती है।

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