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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



जीवन की नई राह


नीरजा द्विवेदी


हलो मां , मुझे आकर ले जाओ. श्री मुझे मार रहे हैं—पांखुरी की रोती हुई आवाज़ बंद हो गई— ऐसा प्रतीत हुआ कि फोन उसके हाथ से छीन लिया गया था.

सोनिका रात के दो बजे अचानक बेटी की करुण पुकार सुनकर सन्न रह गई. आधी नींद से जाग कर उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे? उसने कई बार फोन मिलाने का प्रयत्न किया पर व्यर्थ था. विचलित सी वह सोच रही थी कि उसकी बेटी तो ससुराल में बहुत प्रसन्न थी. अच्छा भला परिवार था. हो सकता है पति-पत्नी मे कुछ अनबन हो गई हो. अभी बच्ची ही है, डर कर रो रही हो और मुझे फोन कर दिया. सोनिका ने मन को समझाने का यत्न किया कि कल सुबह ही श्रीकांत घर आया है. पांखुरी अभी पंद्रह बरस की पूरी नहीं हुई है दुनियादारी की समझ नहीं है अतः किसी बात पर झगडा हो गया होगा. उसने अपने मन को समझाने का यत्न किया कि उसके सास-ससुर भी साथ रहते हैं वे उसे बेटी की तरह मानते हैं. सब ठीक हो जायेगा. ---परंतु ममता आशंकित थी. --आदमियों का क्या भरोसा? बदलते देर थोडे ही लगती है. सोनिका के नेत्रों के समक्ष उसकी अपनी ज़िंदगी चित्रित हो गई.----

सोलह वर्ष की थी जब मेरा स्वयं का विवाह हुआ था. उस समय विपिन मुझे कितना प्यार करता था. पांखुरी के पैदा होने तक सब ठीक रहा पर दूसरी बेटी बांसुरी के बाद वह बदलने लगा जब मैने तीसरे बच्चे के लिये मना कर दिया तब तो विपिन एकदम बिगड गया. रोज ही शराब पीता और मारपीट करता. जुआ भी खेलने लगा. घर खर्च के लिये उसने पैसे देना बंद कर दिया. भला हो डौक्टर शुक्ला का जिन्होंने मेरी दशा पर तरस खाकर मुझे अपने अस्पताल मे नर्सिंग का कोर्स करा दिया. बाद में आस्था से जुडकर नर्सिग का काम करने लगी और जो कमाती हूं उससे घर गृहस्थी का खर्च चलाती हूं.--- आदमी कितने निर्दयी हो जाते हैं. अब विपिन को मेरे दुख- दर्द से कोई लेना-देना नहीं रहता है. न ही उसे बच्चियों से कोई लगाव है. बच्चों की पढाई से लेकर कपडे लत्ते, हारी-बीमारी सभी का प्रबंध मैं ही करती हूँ. भूले-भटके विपिन ने यदि सौ-पचास रुपये कभी दे भी दिये तो दूसरे दिन मुझे मार-पीट कर मेरे पास जो कुछ होता है छीन लेता है. शराब पीकर रात-रात भर गायब रहता है. मुझे घर-ग्रहस्थी का खर्च पूरा करने के लिये सुबह और कभी-कभी रात को भी मरीज़ों की देखभाल के लिये जाना पडता है. विपिन की जुए की लत और गलत संगी साथियों के साथ घर आकर शराब पीने के कारण मैं बेटियों की सुरक्षा को लेकर सशेकित रहने लगी थी कि क्या पता विपिन कब युधिष्ठिर बन जाये और मेरी फूल सी बेटी उसकी जुए की भेंट चढ जायें. पांखुरी की अभी उम्र ही क्या थी? फरवरी मे पंद्रह की होगी. मामा के घर के पडोस मे सम्भ्रांत परिवार दिखाई दिया और उन्होंने स्वयं पांखुरी को बहू बनाने की इच्छा प्रकट की तो मैने हाँ कर दी. घर-बाहर के लोगों ने मुझको बहुत समझाया था कि अभी पाँखुरी का कच्चा शरीर है, इतनी जल्दी ब्याह न करो--- मैं कैसे बताती? अपने घर की, अपने आदमी की बात किससे कहती? कैसे सबको बताती कि विपिन के साथियों की शराब पीकर पांखुरी की ओर उठती टटोलती आंखें मुझे बेचैन कर देती हैं. मैं सोचती कि मैं काम पर जाती हूँ. घर पर बेटियां अकेली रहती हैं ऐसे मे कुछ अघटित न घट जाये. बाहरवाले तो बाहर वाले थे, मुझे तो शराब के नशे में विपिन भी शरीर नोचने-खसोटने वाला हैवान नज़र आता था. इस विचार से मैं भयभीत रहती थी अतः मैने इसी नवम्बर में इधर-उधर से उधार लेकर किसी तरह नाबालिग बेटी का विवाह किया था. विपिन ने बेटी की शादी में भी कोई सहायता नहीं की. अभी बांसुरी आठ साल की है. सोनिका ने तय किया कि उसका भी जल्दी घर बसा दूंगी. सोनिका फिर सोचने लगी---पांखुरी बडे मजे में थी अचानक क्या हो गया? पिछले शनिवार को ही तो मेरे पास आई थी. आगे पढाई के लिये ससुराल वाले राज़ी हो गये थे अतः दसवीं की पुस्तकें लेने आई थी. छोटा परिवार है. सास ,ससुर और एक देवर है सभी पांखुरी को बहुत मानते हैं. दामाद श्रीकांत बम्बई में सर्राफे की दुकान पर काम करता है, उस दिन जब पांखुरी आई थी तो बहुत खुश थी. उसने बताया था कि श्रीकांत दो चार दिन मे आने वाले हैं. सोनिका कितना भी मन हटाना चाहती कि पति-पत्नी का झगडा है, घरवाले सुलझा देंगे पर न जाने क्यों उसके कानों मे बार-बार पांखुरी के रोते स्वर गूंजने लगते थे—माँ मुझे आकर ले जाओ. श्री मुझे मार रहे हैं. उसने पुनः फोन मिलाने का प्रयत्न किया पर फोन नहीं मिला. मामा के यहां फोन मिला कर पांखुरी का हाल जानने का यत्न किया तो फोन किसी ने नहीं उठाया. उसने विपिन को बेटी का हाल लेने जाने के लिये जगाया तो उसके कानों पर जूं नहीं रेंगी. उल्टे सोनिका को गाली देकर वह फिर मुंह पर चादर लपेट कर सो गया.

प्रातः सात बजे फोन की घंटी बजी. बाराबंकी से पांखुरी के श्वसुर का फोन था. उन्होंने सूचित किया कि रात को बहू को फूड पौइज़निंग हो गई थी. दवा नहीं खा रही थी. हालत खराब थी अतः बाराबंकी के सिविल अस्पताल मे भर्ती कराने ले जा रहे हैं. सोनिका कुछ और पूँछती उसके पहले ही फोन कट गया. फोन की घंटी सुनकर विपिन भी जग गया था. नशे का खुमार उतर गया था अतः सोनिका की बातचीत से सब समझ गया. सोनिका को बडा आश्चर्य हुआ जब बिना कुछ कहे विपिन बाराबंकी जाने के लिये शीघ्रता से तैयार हो गया.

सिविल अस्पताल पहुंचने पर इमर्जेंसी मे पांखुरी का कोई पता नहीं चला. सोनिका और विपिन पागलों की भांति बेटी को खोजते फिर रहे थे. इतने में सोनिका के मामा का फोन आया कि मुझे पता-लगा है कि पांखुरी स्टेशन के पास नर्सिग होम मे है और उसकी हालत बहुत गम्भीर है. उसके ससुर पैसों का इंतज़ाम करने गये हैं तो मैं यहां आ गया हूं. तुम लोग पैसों का इंतज़ाम करके आओ.

सोनिका और विपिन जब नर्सिंग होम मे पहुँचे तो उसके मामा अस्पताल के बाहर ही मिले. जब उन्होंने बताया कि पांखुरी नहीं रही तो सोनिका सन्न रह गई. पांखुरी के ससुराल वालों का कोई अता-पता नहीं था. श्रीकांत का छोटा भाई पांखुरी को इमर्जेंसी मे भर्ती कराके चला गया. उसने बताया था कि पापा पैसों का इंतज़ाम करके आयेंगे. उन्हें पांखुरी के मरने की सूचना दे दी थी. अब न तो श्रीकांत फोन उठा रहा है न उसके घर वाले. विपिन ने भी फोन मिलाने की कोशिश की पर किसी ने फोन नहीं उठाया, घंटी बजती रही. सोनिका और विपिन ने किसी तरह पैसा एकत्रित करके वहां का बिल चुकाया. नर्सिंग होम में पैसा जमा करने के बाद बहुत भटकने के बाद यह ज्ञात हुआ कि पांखुरी नामक मरीज़ का कोई रिश्तेदार मौजूद नहीं था अतः उसके शव को शव-विच्छेदन-गृह में भेज दिया गया है.

सोनिका और विपिन दौडते-भागते शव विच्छेदन गृह में पहुंचे तब तक शाम हो चुकी थी. चपरासी ने किसी भी हालत में उसकी बेटी का शव उसे दिखाने से इंकार कर दिया. सोनिका के मामा ने बहुत चिरौरी विनती की, कुछ भेंट भी चढाई तब जाकर चपरासी ने कुछ मोहलत दी कि सोनिका अपनी बेटी का मुख देख पाई. उसने पांखुरी के शरीर का शीघ्रता से भली-भाँति निरीक्षण किया. उसकी फूल सी कोमल बच्ची के आँख और गाल पर नील के निशान थे. शरीर पर चोटें भी थीं. बेटी की दशा देखकर उसका हृदय हाहाकार कर रहा था. मन ही मन वह स्वयं को दोषी मानकर कोस रही थी. पाँखुरी पढने में बहुत तेज थी. वह शादी न करने के लिये कितना रोई थी पर सोनिका के समझाने पर उसने हथियार डाल दिये थे और अपने भाग्य से समझौता कर लिया था. सोनिका करती भी क्या? उसकी दशा तो उस व्यक्ति की तरह थी जिसके एक ओर कुआँ हो और दूसरी ओर खाई. नाबालिग कन्या के विवाह के दुष्परिणाम से वह परिचित थी परंतु विपिन की जुए और शराब की लत और उसके शराबी संगी-साथियों की बेटी की ओर उठती लोलुप दृष्टि से वह आतंकित थी. जैसे ही एक रिश्ता आया वह मान गई. पति साथ न दे रहा हो, अपने सीमित साधन हों और अकेले दम पर लडकी की शादी करनी हो तो सोनिका क्या ऐसे में कोई अन्य स्त्री होती तो वह भी यही करती. सोनिका अभी भी सोच नहीं पा रही थी कि उसकी निर्दोष बेटी की हत्या क्यों हो गई? उसके नेत्रों से आँसुओं की जो गंगा-जमुना बहना शुरू हुई तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. सोनिका के मामा विपिन को लेकर थाने पर रिपोर्ट लिखवाने चले गये. रात को रिपोर्ट नहीं लिखी जा सकी. मुंशी ने बताया कि शव-विच्छेदन की रिपोर्ट आ जाने के बाद रिपोर्ट लिखी जायेगी.

सोनिका पर दबाव पडने लगा कि तुम्हारी बेटी चली गई, लौट कर तो आयेगी नहीं. श्रीकांत को माफ कर दो. उसने जान-बूझ कर कुछ नहीं किया. किसी बात पर उसका गर्म खून उबल गया और उसका थप्पड पांखुरी को जोर से लग गया. उसे क्या मालूम था कि ऐसा हो जायेगा. कोई खास बात नहीं थी. श्रीकांत इतने दिनों बाद बम्बई से आया था. उसे पास बुला रहा था. पांखुरी उसके पास आ नहीं रही थी. इसी मे बात बढ गई. तुम समझौता कर लो और लाख-दो लाख रुपये लेकर केस वापस ले लो. सोनिका के घर वाले भी समझाने लगे कि अपनी स्थिति को देखो. तुम्हारी दूसरी बेटी भी है. समझौता कर लो और चैन से रहो. सोनिका इन बातों को सुनती तो एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती. विपिन ने उसको बताये बिना श्रीकांत से तीन लाख रुपये ले कर समझौता कर लिया और केस वापस ले लिया. जब सोनिका को यह बात पता चली तो उसका खून खौलने लगा. पति-पत्नी दोनों मे जम कर झगडा हुआ और सोनिका अपनी छोटी बेटी को लेकर घर से निकल आई. उसने कसम खाई कि न तो बेटी के कातिल को क्षमा करेगी और न अपने पति को जिसने हत्यारे से पैसा ले लिया है.

सोनिका एक पुलिस अधिकारी श्री राजीव शर्मा की वृद्धा मां की सेवा के लिये रात को उनके घर पर कार्य करती थी. उन लोगों ने उसे आश्रय दिया. सोनिका को तीन दिन बाद पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मिल पाई. रिपोर्ट में किसी चोट का उल्लेख नहीं था अतः थाने पर कोई रिपोर्ट नहीं लिखी गई. जब सोनिका ने शर्मा जी को बताया कि मेरे मोबाइल में मेरी बेटी के अंतिम शब्द कि ----मां मुझे आकर ले जाओ श्री मुझे मार रहे हैं,---मैने रिकौर्ड कर लिये हैं तो उन्होंने स्थानीय पुलिस अधिकारियों को सही बात बता कर सोनिका की रिपोर्ट लिखवाई और दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की संस्तुति की. एक सी.ओ को जांच सौंप दी गई. जांच में श्रीकांत को दोषी पाया गया और गैर इरादतन हत्या का केस धारा 304 में मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

सोनिका बेटी की फोटो देख कर रोती रहती. उसने ठीक से खाना-पीना छोड दिया और पागलों की तरह वकीलों के चक्कर काटने लगी. उसने कर्ज़ लेकर किसी भी तरह बेटी के हत्यारे को सजा दिलवाने का ध्येय बना लिया. उसकी दयनीय हालत पर राजीव शर्मा की मां को बहुत तरस आता था. एक दिन जब सोनिका अपनी बेटी की फोटो लेकर रो रही थी, माता जी ने उससे कहा--- सोनिका! क्या इस तरह तुम्हारी बेटी वापस आ जायेगी? सोनिका आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगी तो माता जी बोलीं---देखो जिसकी जितनी आयु होती है और जितना भोग होता है. वह उतना समय भोग कर चला जाता है. हम इसे न घटा सकते हैं न बढा सकते हैं. पांखुरी अपना भोग भोग कर चली गई. रो-रो कर उसकी आत्मा को कष्ट न दो. जाने वाले को अपने बंधन से मुक्त कर दो. आत्मा अमर होती है. यदि पांखुरी को प्यार करती हो तो उसकी स्मृति को अमर करो. तुमने श्रीकांत को जेल तो भिजवा ही दिया. अब अपने सीमित साधनों को देखकर कर्ज़ लेकर वकीलों के चक्कर मे न पडो. देखो तुम पति से अलग रह रही हो. अभी एक बेटी है जिसका उत्तरदायित्त्व तुम्हें निभाना है.

सोनिका आंसू पोंछते हुए बोली—मैं क्या करूं, बेटी की शकल आंख से ओझल नहीं होती. उसके आखिरी शब्द कानों मे सीसा सा घोलते हैं. मुझे कुछ नहीं सूझता.

माताजी ने सोनिका को समझाया और कहा कि अपनी बेटी की अकाल मृत्यु के लिये किसी न किसी रूप में तुम भी उत्तरदाई हो.

सोनिका स्तब्ध हो गई मुंह से निकला—वह कैसे?

माताजी ने कहा—तुमने अपनी बेटी का विवाह शादी की आयु होने के पहले ही कर दिया. सोचो क्या तुम्हारी बेटी पति के प्रति दायित्त्व निभाने के योग्य हो पाई थी? तुम्हारे दामाद ने उसे जान-बूझ कर नहीं मारा होगा. पांखुरी का कोमल शरीर उसके आवेश को नहीं सहन कर पाया होगा और उसको घातक चोट लग गई.

सोनिका रोते हुए बोली—मैंने इस दृष्टि से तो सोचा ही नहीं था. मैं यह सोच कर परेशान थी कि जब उन लोगों ने मांग कर मेरी बेटी ली थी फिर उसके साथ यह सब कैसे हो गया? आपकी इस बात ने तो मुझे दोषी बना दिया. अब मुझे यह सोच-सोच कर चैन नहीं मिलेगा.

माता जी ने समझाया—मैंने पढा है कि हर व्यक्ति का अपना भाग्य होता है जिसके अनुसार उसका भोग होता है. तुम्हारी बेटी अपना समय पूरा करके गई. अब तुम उसके लिये रोने की जगह उसकी स्मृति मे ऐसे कार्य करो कि जिससे दूसरी बेटियां वह सजा न भुगतें जो तुम्हारी बेटी को भोगनी पडी. तुम कुछ समय किसी संस्था से जुड कर सेवा कार्य करो. जो कोई अपनी नाबालिग कन्या का विवाह करने वाला हो उसे रोको. उसे समझाओ. जब किसी कन्या का जीवन बर्बाद होने से बचा लोगी तब तुम्हें खुशी मिलेगी और तुम्हारा प्रायश्चित भी होगा.

सोनिका ने अपने आंसू पोंछे और माता जी के चरण छू कर बोली—आपने मुझे जीने की राह दिखा दी अन्यथा मैं रो-रो कर पागल हो जाती कि बेटी की दोषी मैं भी हूं. मुझसे जो गल्ती हुई है वह मैं औरों को नहीं करने दूंगी. ---यह कह कर सोनिका ने पांखुरी का फोटो आंख भर कर देखा और पर्स मे रख लिया.

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