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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



यूँ ही सहन करता जाऊं!!


डॉ० अनिल चड्डा


ख्वाहिशें अपनी भी थी बहुत सारी,
जद्दोजहद में सभी की सभी हारीं।
 
धुंधला न जायें यादों की गर्द से तस्वीरें,
रोज रो-रो कर हैं दिल ने सँवारी। 
 
खो गए तुम जिन राहों पे चलते-चलते,
वही राहें बन गईं हमें तो प्यारी ।
 
‘अनिल’ को जहाँ भी मिलता चैन कोई,
वहीँ पर उसने है जिन्दगी गुजारी।
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