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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



अकेले भी खुद हैं


डॉ० अनिल चड्डा


अकेले भी खुद हैं, दुकेले भी खुद हैं,
वीरानियों के मेले भी खुद हैं।
 
समां बात करता नहीं आज हमसे,
परेशानियों से हरदम खेले भी खुद हैं। 
 
न राहों के काटे चुभेंगे हमें अब,
खारों की मानिंद विषैले भी खुद हैं। 
 
न आगाज मालूम, न अंजाम मालूम,
मायूसियों को झेले भी खुद हैं।
 
नहीं दोष देते किसी को ग़मों का,
ग़मों के अपने झमेले भी खुद हैं।
 
नहीं बदलेंगे जमाने के संग हम,
पुराने भी खुद, नये-नवेले भी खुद हैं।

बहुत बात कर ली दुनिया से हमने,
उजले भी खुद हैं, मैले भी खुद हैं।
 
'अनिल' को बताया न रस्ता किसी ने,
गुरु भी हमीं हैं, चेले भी खुद हैं।
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