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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



(गुरुपूर्णिमा पर विशेष)
गुरु पर दोहे


सुशील शर्मा


 		 
गुरु अमृत है जगत में ,बांकी सब विषबेल
सतगुरु संत अनंत हैं ,प्रभु से करदें मेल।

गीली मिट्टी अनगढ़ी ,हम को गुरुवर जान।
ज्ञान प्रकाशित कीजिये ,आप समर्थ बलवान।

गुरु बिन ज्ञान न होत है ,गुरु बिन दिशा अजान।
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें ,गुरु बिन बढे न शान।

गुरु मन में बैठत सदा ,गुरु है भ्रम का काल।
गुरु अवगुण को मेटता,मिटें सभी भ्रम जाल।

शिष्य वही जो सीख ले ,गुरु का ज्ञान अगाध।
भक्ति भाव मन में रखे ,चलता चले अबाध।

गुरु ग्रंथन का सार है ,गुरु है प्रभु का नाम।
गुरु अध्यात्म की ज्योति है ,गुरु हैं चरों धाम।

अन्धकार से खींच कर मन में भरे प्रकाश।
ज्यों मैली चुनरी धुले ,सोहत तन के पास।

गुरु की कृपा हो शिष्य पर ,पूरन हों सब काम
गुरु की सेवा करत ही ,मिले ब्रम्ह का धाम।

गुरु अनंत तक जानिए ,गुरु की ओर न छोर।
गुरु प्रकाश का पुंज है ,निशा बाद का भोर।



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