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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



दोहे – नेह जलद


पुष्पा मेहरा


 		 
१. नेह जलद घिर कर आए,हटा ताप संताप | हवा पेड़ के गले लग,करती प्रेमालाप ||
२. उमड़-घुमड़ बादल घिरे,गरज,डरावें घोर | जैसे दम्भी जन सभी,हुंकारें पुरजोर ||
३. आए बादल गगन में,लाए बूँद उपहार | धरती गदगद हो गई,मिला सजन का प्यार ||
४. बिछुआ वर्षा का बजा,जागी भाव तरंग | छोड़ उदासी भर गई,मन में प्रेम उमंग ||
५. सावन की आवाज सुन,धरा का नाचा मन | हवा निशाचरी आकर,ले भागी सभी घन ||
६. तप कर पानी उड़ चला,छूने अम्बर छोर | दानी बादल बना वह,बरस गया घनघोर ||
७. आम्र तरु पर बैठ कर,कोकिल,सोच,उदास | पेड़ों बिन कैसे रहें,रूँधी हमारी श्वास ||
८. कहाँ गये जल बावड़ी,और कमल के ताल | रूठी क्यों बरखा सखी,प्रश्न करे बैताल ||
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