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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



अनुदित लघुकथा - कदम


लेखक: नसीम महुवाकर
अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह


अनुज ने आज निर्णय कर ही लिया.मम्मी का ओपरेशन करवाना ही है.या तो इस पार या उस पार.मैंने भी सम्मति दे दी.डॉक्टर ने दो संभावनाएं दिखाई थी: या तो अनुज की मम्मी अपने आप चलने लगे या बैसाखी पकड़कर जो कड़ी हो जाती है,वह भी बंद हो जाये.

अनुज की मम्मी को पैर की तकलीफ लम्बे अरसे से थी.बारबार पूरे पैर में झनझनी उठती है.पैर में जकडन आ जाती है.असह्य जलन होती है.चलने में बहुत परेशानी,दर्द कभी कम होने का नाम नहीं लेता. इलाज तो चल ही रहा था फिरभी तकलीफ बढती गई. एक दिन खड़े होते होते वह जमीं पर गिर गई.कमर में बड़ा झटका लगा.शिथिल हो गए पैर ने जवाब दे दिया.ओपरेशन ही आखिरी इलाज था.

ओपरेशन हो गया.हम निराश हुए. फिजियोथेरापिस्ट का इलाज भी चलता रहा.कई कितनी ही एक्सरसाईंज के बाद वह पहले की तरह मात्र बैसाखी पकड़कर खड़ी रह सकती थी.हम तो वहां थे जहाँ हम पहले थे.अनुज रोज रत को आकर उसकी मम्मी की सेवा-शुश्रूषा करता रहता था.वह आज भी उसके कमरे में था.मैं तो ड्रोइंग-रूम में टी.वी.देखता रहा था.

``पप्पा ! ओ पप्पा ! पप्पा...जल्दी अन्दर आइये.’’ अनुज की चीख से मुझे चिंता हो गई.मैं भी बेड-रूम की ओर दौडा. देखा कि अनुज की मम्मी अनुज का हाथ पकड़कर खड़ी थी.अनुज का मुख पर ख़ुशी झलक रही थी. ``पप्पा! देखिये,मम्मी चल रही है.’’उसने अपनी मम्मी का हाथ कसकर पकड़ा .उसकी मम्मी ने पैर उठाकर कदम भरा.

मेरी आँख और मन तो कहीं गहरे में बह चले. बरसों पूर्व अनुज की मम्मी भी ऐसे ही पुकार उठी थी.`अनुज के पप्पा! ओ अनुज के पप्पा! जल्दी जल्दी भीतर आइये तो....’’

मैं गया तब छोटे से अनुज का हाथ थामे उसकी मम्मी ऐसे ही खड़ी थी.

``देखिये,आपका बेटा चला.’’और अनुज ने मेरी रूबरू अपनी जिंदगी के पहले कदम भरे थे.उसने मम्मी का हाथ थामकर पहली बार चलता हुआ देखकर मेरी आँखें भी बहने लगी थीं.

आज पुन: वही बाढ आई.

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