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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



छोडो मोक्ष की बात और करो सुन्दर जीवन की बात


लेखक : पद्मश्री डॉ.गुणवंत शाह
अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह


कुछ दिन पूर्व बुद्धपूर्णिमा की रात्रिवेला में एक विचार परेशान कर गया। विचार द्वारा होनेवाली परेशानी को बरदाश्त करना मेरी प्रिय होबी है। उस परेशानी का प्रसाद मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। सुनिए।

``जीवन के पहले एजंडा पर
पहली आइटम प्रेम है।
मुझे प्रेम करनेवाले चंद
नीमपागलों का स्मरण कर
मैं बुद्धपूर्णिमा की चांदनी का
अभिवादन करना चाहता हूँ।
जो केवल मेरे सदगुणों से ही
प्यार करते हैं, वे सभी खतरनाक लोग हैं।
मुझे अपनी मर्यादाएं प्रिय हैं
क्योंकि ये मर्यादाएं ही मुझे
मनुष्य के रूप में जीने का
खुलापन देती हैं!
मैं केवल मनुष्य के रूप में ही
जीना और मरना चाहता हूँ।
मोक्ष मेरे एजंडा पर नहीं है।’’

``आख़िरकार मोक्ष किस लिए?’’

किसी करुणाशील संत ने संस्कृत में श्लोक के रूप में प्रार्थना की रचना की है:

मैं राज्य नहीं चाहता ,
मैं स्वर्ग नहीं चाहता ,
मैं मोक्ष नहीं चाहता,
मैं तो ऐसी भावना रखता हूँ कि
दु:ख तप्त प्राणियों की पीड़ा का नाश हो!’’

बौद्ध धर्म की परंपरा में एक कथा मशहूर है। इसवी.८०० के अरसे में शांतिदेव नामक एक साधु हो गए। पूर्वाश्रम में वे राजकुमार थे और बौद्ध धर्म अंगीकार किया। वे अध्ययन के लिए नालंदा विद्यापीठ गए। विद्यार्थियों को उनका स्वभाव कुछ विचित्र सा लगता था। मित्र उन्हें नीमपागल समझते थे। वे मित्र जब अध्ययन करते थे तब शांतिदेव सोये रहते थे। समग्र नालंदा विद्यापीठ में शांतिदेव की विचित्रता मशहूर हो गई लेकिन उनकी साधना गुप्त गंगा की तरह चलती ही रही। यह साधना किसी विद्यार्थी को दिखाई नहीं देती थी।

एक दिन नालंदा विद्यापीठ के अधिकारियों ने शांतिदेव को बुलाया। निश्चित दिवस पर अध्यापकगण और विद्यार्थीगण की बैठक हुई। विद्यार्थियों को मन में यह बात बैठ गई कि नीमपागल ऐसे हमारे शांतिदेव को आज विद्यापीठ से निकाल बाहार कर दिया जायेगा। पूर्व निश्चित दिन आ गया। सब के मन में एक ही सवाल उठता-बैठता रहता था कि ``आज शांतिदेव का क्या होगा?’’

निश्चित समय सभा स्थल पर सारे एकत्र हुए। सजा का वक्त आने से पहले ही शांतिदेव ने याचना की कि:``मुझे प्रवचन करने की अनुमति प्रदान की जाये।’’यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने अनुमति प्रदान की। शांतिदेव ने सामने बैठे हुए छात्रों से पूछा,``आप जो कुछ पढ़े हैं,उसके विषय में बोलूं या जो नहीं पढ़े हैं-उस विषय पर बात करूँ?’’समवेत स्वरों में छात्रों ने उत्तर दिया कि ``हम जो नहीं पढ़े हैं, उस विषय पर आप कुछ कहिये।’’शांतिदेव का व्याख्यान ख़त्म हुआ। उनके वाणीप्रवाह में सारे श्रोता मानो तल्लीन हो गए! शांतिदेव ने जो कुछ भी गुप्त साधना से अर्जित किया था,वह उनकी वाणी में प्रवाहित होने लगा। सारे श्रोता आश्चर्य और अहोभाव अनुभव करने लगे। सभा से एक मधुर ध्वनि व्यक्त हुई: ``साधो! साधो! साधो! प्रवचन पूर्ण होते ही शांतिदेव आकाश मार्ग से जाने लगे। जाते समय एक सबको एक सन्देश दे गए:`` बाह्य दिखावा या वर्तन पर से कभी भी किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन न करें।’’

कोई मोक्षार्थी निर्वाण के लिए साधना भले ही करे,पर एक करोड़ मनुष्यों में से मुश्किल से एकाध मनुष्य प्राप्त करे तो करे! शेष निन्यानब्बे लाख निन्यानब्बे हजार नौसो निन्यानब्बे लोग सुन्दर जीवन की दीक्षा प्राप्त करे ऐसा होना चाहिए। जो सचमुच में मोक्षार्थी हैं,वे तो अपना रास्ता बना ही लेंगे। शेष सारे नाहक ही घसीटते हुए चलते हैं और सुन्दर जीवन जीने से चूक जाते हैं। प्राथमिक कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों को पी-एच.डी. की कक्षा पर बात हो ऐसी बातें करने का क्या मतलब? ऐसे लोगों को तो दोनों तरफ से नुकसान है। न तो मोक्ष ही मिलता है और न ही जीने का आनंद ही मिल रहा! हमारी गरीबी की जड़ें शायद देहविरोधी,मनविरोधी,सहजविरोधी,प्रकृति

विरोधी और श्रीविरोधी ऐसे तथाकथित धर्म के अस्पष्ट अत्याचारों में पडी हुई दिखाई देती है। शायद सुन्दर जीवन मोक्ष की दिशा में ले जाये ऐसा संभव हो सकता है! याद रखिये कि मोक्ष का सम्बन्ध भी `परम आनंद’ के साथ है,कष्ट के साथ नहीं।मुझे तो लगता है कि जीवन इतना सुन्दर है कि बारबार जीने का मन करे! आदरणीय मोरारिबापू कभी मौज में आ जाये तो एक बात सार्वजनिक रूप में कहते हैं:`` मुझे तो बार बार जन्म लेना है। उपरांत तलगाजरडा(बापू की जन्मभूमि) में जन्म लेना है और रामकथा करनी है।’’मुझे तो ऐसी तिव्रेच्छा स्वस्थता की सहोदर सी लगती है। कैक्टस के ठूंठ सा वैराग्य भी मनुष्य को इतनी आसानी से हजम नहीं होता। विनोबा ने कहा है,``वैराग्य भी लालित्ययुक्त होना चाहिए। जीवन कोई शुष्कता की बखार नहीं है।’’

छोटे छोटे वादे तोड़नेवाले को कोई `चरित्रहीन’ क्यों नहीं कहा रहा? किसी से मिलने के पूर्वनिश्चित समय पर यदि न पहुंचा जाये तो उसका कोई गम या अफ़सोस अनुभव नहीं होता ,उसे कोई `नफ्फट’ क्यों नहीं कहता? पैसों का लेन देन तो मानव सम्बन्ध के लिए उपकारक और अनिवार्य ऐसा सद्व्यवहार है। उसे जहाँ तक संभव हो स्वच्छ रखना चाहिए। उसीमें इंसानियत की महक है। पृथ्वी ऐसी असंख्य लेन-देन पर टिकी हुई है। अल्लाह के किसी बन्दे ने एक सूफी फ़क़ीर से कहा:``मुझे खुदाताला की कोई मजेदार कहानी सुनाओ।’’ फ़क़ीर ने उससे कहा:``अल्लाह की बात बाद में, तुम सबसे पहले अपने उंट को खूंटे से बांध दो।’’ दान स्वीकार करने बाद रसीद नहीं देनेवाले किसी कर्मशील से आप कभी मिले हैं? उस कर्मशील को आप दो बार स्मरण दिलाएं तो भी वह रसीद नहीं भेजेगा। यदि वह कर्मशील सेवा छोडकर नौकरी करने लग जाये तो भी बहुत!स्वराज प्राप्ति के बाद के दशक में संत केदारनाथजी ने `व्यवहार शुद्धि आन्दोलन’ चलाया था। उनका खास सन्देश यह रहा कि ``व्यवहार शुद्धि ही चित्तशुद्धि की बुनियाद है। जब तक चित्तशुद्धि न हो तब तक अध्यात्म कभी जमेगा नहीं।’’ लोग आजकल गंदे कपडे से अपना गन्दा टेबल स्वच्छ करना चाहते हैं। सुन्दर जीवन तो कहीं दूर रह जाता है और आश्रम में भीड़ बढ़ती रहती है। मोक्ष की माय भी इतनी अटपटी? स्वच्छ जीवन के साथ छात्रों को प्रेमपूर्वक पढानेवाले किसी प्राथमिक शाला के शिक्षक से आप कभी मिले भी हैं?अवश्य मिलिएगा।

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पते की बात:

तिलक,टोपी,माला,देवों से भरा बस्ता।
करता दिखावा पेट के लिए।
तुलसी लगाये कान में, दर्भ खोंसे शिखा में,
व्यर्थ ही पकडे रहे नासदंडी।
कीर्तन के वक्त रोये,गिरे,लोटने लगे,
प्रेम बिना ही कंठ से गदगद हो,
कथा कहकर दिखाए प्रेमकला बड़ी
भीतर भरा रस कुकर्मों का ,
बैरागी के भेष में देखे परनारी,
कामलोभ से भरी वृत्ति जिसकी।
तुका कहे ऐसे माया के गुलाम,
उसके पास कभी राम न होये!
-संत तुकाराम
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