Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



भोजपुरी कहानी- मुजरा


अनुवादक -राजकुमार सिंह
मूल लेखक जनकदेव जनक


मैं डीएन हाई स्कूल जनता बाजार से स्थानांतरण होकर भगवानपुर हाट स्थित हाई स्कूल में आ गया था। यहां के छात्र-छात्राओं के बीच काफी खुश था। एक महीना कैसे बीत गया, कुछ पता नहीं चला। स्कूल का अनुशासित वातावरण अच्छा लगा। नये शिक्षक के प्रति विद्यार्थियों का मधुर संबंध एवं आज्ञाकारी स्वभाव मन भावन लगा। विद्यार्थियों के आचार- व्यवहार पर मैं निहाल था। गुरु-शिष्य के बीच अनोखा स्नेह और प्यार देखकर स्कूल के प्रधानाचार्य शंकर दयाल ठाकुर भी सदा प्रसन्न रहते थे।

सर्दी का मौसम था। आसमान बादलों से आच्छादित था। इसी बीच बेदर्दी पछिया हवा भी कभी-कभी तेज हो जा रही थी जिसके कारण रह-रह कर हाथ-पैरों में कंपकंपी सी समा जाती। तीर जैसी चुभती ठंडी बयार का सामना कोट, जैकेट और स्वेटर नहीं कर पा रहे थे। इसलिए सभी जाड़ा के गुलाबी धूप के इंतजार में आकाश की ओर टकटकी लगाए हुए थे। अचानक बादलों की ओट से आदित्य देव लुका-छिपी खेलते हुए धरती की ओर झांकें। धूप निकलता देखकर मैदान में खेल रहे छोटे-छोटे बच्चे अपना-अपना हाथ एक दूसरे से जोड़ाकर खुशी में नाचने और अपना कोरस एक ही स्वर में अलापने लगे....

‘ रामजी-रामजी घाम कर-अ सुग्गवा सलाम कर-अ, तोहरा बालकवा के जाड़ लागता पुअरा फुकी -फुंकी तापता...’

आर्थात हे, सूर्य देव धूप कीजिए... ठंड से कांपता तोता प्रणाम कर रहा है.... तुम्हारे बालकों को ठंड लग रही है.... वे पुआल फूंक कर आग ताप रहे हैं...

स्कूल की फूलवारी में कुर्सियां लग गईं थीं। प्रधानाचार्य के साथ शिक्षकगण भी बैठे हुए थे और सभी जाड़ा के गुनगुनी धूप का आनंद ले रहे थे। ठीक उसी वक्त साईकिल पर सवार चौदह पंद्रह विद्यार्थी वहां पहुंचे। वे अपनी साइकिलों को

स्टैंड पर खड़ा किया और अदब के साथ मुझे , प्रधानाध्यापक और अन्य शिक्षकों को प्रणाम किया। वे कुछ बोलना चाह रहे थे कि प्रधानाचार्य उनकी तरफ मुखातिब हुए और पूछ बैठे,

‘ तुम लोग कहाँ से आ रहे हो ? कुछ काम है क्या?’

‘सर...सर...सर...’ उनमें से एक लड़का हकलाकर कुछ कहना चाहा।

‘ हाँ...हाँ बोलो...,किससे काम है? मैट्रिक का फॉर्म भरवाना है क्या ?’

‘ नहीं ..नहीं ..सर...हम लोग अभय दुबे जी सर के पुराने छात्र हैं... उनसे मिलने के लिए डीएन हाई स्कूल जनता बाजार से आये हैं।’ उसी छात्र ने अपनी पूरी बात बताई।

‘ अच्छा तो तुम लोग दुबे जी के छात्र हो...तुम सब की गुरु भक्ति देखकर मन खुश हो गया। कौन

कहता है कि आज-कल गुरु-शिष्य का संबंध बिगड़ रहा है। तुम लोगों का बढ़िया शिष्टाचार देख कर

मन अघा (प्रसन्न) गया। अच्छा, तुम लोग दुबे जी से बातें करो, मैं अपना क्लास लेकर लौटता हूं। तुम्हीं जैसे अज्ञाकारी व चरित्रवान विद्यार्थी ही अपनी जिंदगी में तरक्की और प्रगति करते हैं। वे अपनी मंजिल को पाने में कामयाब होते हैं। सबके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।’ इतना बोल कर प्रधानाचार्य एसडी सिंह अपनी क्लास की ओर बढ़ गये।

प्रधानाचार्य के जाने के बाद डबडबाई आंखों से राजेश ने मुझे देखा और धधाकर (बेसब्र होकर) मेरे पैरों पर गिरकर रोने लगा। उसकी आंखों से झर-झर आंसू झड़ रहे थे। वह रोते रोते अचानक बोल पड़ा,

‘ सर..., मुझे माफ कर दें.... आप के साथ ...मैंने बहुत बड़ी ...गलती कर दी है..., माफ कर दें सर....,मेरा लाइफ ….चौपट हो गया है सर...’

‘हाँ सर..., राजेश को माफ कर दीजिए. यह अनुशासनहीनता के आरोप में स्कूल से निकाल दिया गया है...अगर ...आप इसे मदद नहीं करेंगे तो यह मैट्रिक का फॉर्म नहीं भर पायेगा! और परीक्षा देने से वंचित हो जायेगा।’ तभी दूसरे छात्र उमेश ने अनुनय करते हुए विनती की।

‘ ओह ! अरे...राजेश...उठो ...उठो..., नेक काम में देर है अंधेर नहीं....., तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है... देर से आए दुरुस्त आए...’ मैंने राजेश को उठाते हुए ढांढस बंधाया।

‘ सर.... मुझे दुख है कि …..आपने यहाँ ...मेरे कारण ….स्थानांतरण ...करा लिया...सर..., यहां से वापस लौट चलें...यहीं विनती करने हम सब आयें हैं। ’ राजेश अपने गालों पर ढलक आये आंशुओं को पोछते हुए प्रायश्चित किया।

‘ अरे...रेरे...ऐसी बातें नहीं है...मैं तो निजी कारणों से यहां अपना तबादला करा कर आ गया था। तुम लोगों की यही इच्छा है तो फिर से वहां जाने की कोशिश करुंगा।’ मैंने उन्हें आश्वासन तो दिया, लेकिन वह जो कह रहा था वही सच्चाई थी।

उनके लौटने के बाद डीएन हाई स्कूल की पिछली घटना मेरे मानस पटल पर उभर आई।मैं भावनाओं के सागर में गोते लगाने लगा। मेरे दिमाग पर राजेश द्वारा किए गये अशिष्ट व्यवहार की चोट हथौड़े की तरह ठक-ठक करने लगी। मैं अपने स्कूल के कार्यालय में बैठा हुआ छात्र-छात्राओं की कॉपियों की जांच कर रहा था। उसी समय स्कूल का चापरासी मंटू अंदर आकर बोला,

‘ सर , आपसे कोई मिलना चाहता है। ’ कॉपी जांचने के क्रम में ही मैंने उत्तर दिया कि उन्हें अंदर भेज दो!

‘नमस्कार दुबे जी...’

‘नमस्कार...नमस्कार !’

मैंने जानी पहचानी आवाज पहचान कर अपनी नजरें कॉपी से ऊपर उठाई और आगंतुक की ओर देखा। सामने भगवानपुर हाट के लक्ष्मण तिवारी खड़े थे। उनके शरीर पर उजर धप-धप बगुला की पंख जैसी धोती-कुरता और उसके ऊपर करिया कुचकुच हाफ बंडी थी। उनके कंधे पर लाल टेस चेकदार गमछा बिल्कुल झकास लग रहा था।

‘ अरे तिवारी जी आप ! आइये -आइये बैठिए, आज किधर से रास्ता भूल गये?’ उनके सम्मान में मैं खड़ा हो गया और बैठने का आग्रह किया.

‘ क्या बताये दुबे जी, बड़े पुत्र रमेश बाबू की शादी ठीक हो गई है। नाच-शामियाना, टैंट, बैंड-बाजा, डोली-पालकी, हाथी-घोड़ा आदि का सट्टा करने के लिए जहां तहां बंवड़ेड़ा (भंवर) की तरह चक्कर काटते फिर रहा हूं। सुना हूं कि जनता बाजार में गिरि बाबा का नाच बहुत अच्छा है। आप चल कर सट्टा-बायना करा देते।’ तिवारी जी ने विनम्र भाव से निवेदन किया।

‘ अरे, तिवारी जी मेरे जैसे अनाड़ी आदमी को सट्टा-बायना के चक्कर में क्यों घसिट रहे हैं। मैं सीधा सादा आदमी भला सट्टा -बायना का हाल क्या जानूं !मेरी सलाह माने तो आप जनता बाजार थाना के थानेदार डीएन पांडेय के पास चलें। अगर उनसे मुलाकात हो गई तो समझिये की काम हो जायेगा। आम का आम और गुठली का दाम मिल जायेगा।’

‘मैं समझा नहीं, आप क्या कहना चाहते हैं? ’ तिवारी जी बिल्कुल किसी अनभिज्ञ व्यक्ति की तरह बोले।

‘ मेरा मतलब है कि महंगा नाच सस्ते में पट जायेगा और ताबले की थाप पर आप दो चार मुजरा भी सुन लेंगे। ’

‘ अरे वाह ! दुबे जी, आपने तो मेरे मन की बात छीन ली। चलिए, दारोगा जी से मिल लिया जाए। ’

स्कूल की अंतिम घंटी बजी। 10 वीं कक्षा में मेरी हिंदी की घंटी थी। अचानक तिवारी जी के आ जाने उस घंटी को छोड़ देना पड़ा। स्कूल के प्रधानाद्यापक से छुट्टी लेकर तिवारी जी के साथ निकल पड़ा।

लक्ष्मण तिवारी भगवानपुर हाट के इज्जतदार लोगों में से एक थे. वे सामाजिक कार्यों में बढ-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। किसी गरीब की लड़की की शादी हो या किसी बीमार व्यक्ति की सेवा , जितना हो सकता उतनी सेवा वे तन, मन और धन से करते थे।

मैं उनके साथ गप-शप करते हुए थाना पहुंच गया। एक सिपाही से पूछने पर पता चला कि दारोगा जी किसी छापामारी में निकले है। लेकिन मुझे समझ में नहीं आया कि रात को छोड़ कर दारोगा जी शाम की छापामारी में कहाँ निकले हैं? अलबत्ता, मैं तिवारी जी को लेकर टेलीफोन एक्सचैंज ऑफिस के पास पहुंचा, उसी की बगल में गिरि बाबा का नाच घर था।

एक बड़े हॉल में नाच गान की महफिल सजी थी। गाँव-जवार के नामी-गिरामी लोग मस्ती की चासनी लूटने के लिए जुटे थे। जिसमें मुखिया, सरपंच, डॉक्टर, वकील,व्यापारी आदि के साथ दारोगा डीएन पांडेय भी आसन जमाये हुए थे। कोई मगहिया पान खाकर पीकदानी में पुच्च-पुच्च थूक रहा था तो कोई प्याला पर प्याला जाम का पैमाना छलका रहा था।

इसी माहौल में अचानक तिवारी जी टपक पड़े। जान-पहचान के लोग खड़ा होकर उनका स्वागत किया। बड़ा आसामी पाकर नाचवाले गिरि बाबा फूले नहीं समा रहे थे। सोच रहे थे कि तिवारी जी को किधर बैठाये और किस तरह से स्वागत करें कि उनका दिल दरियाव हो जाए., इसी कोशिश में थे। बाद में वे दारोगा जी से परिचय कराये। उसके बाद उन्हीं की बगल में तिवारी जी को बैठने का आसन दिया।

लक्ष्मण तिवारी के बैठने के बाद मैंने दारोगा डीएन पांडेय से सट्टा वाली बात बता दी कि तिवारी जी अपने बेटे की शादी में गिरि बाबा का नाच ले जाना चाहते हैं। दारोगा जी अभी कुछ बोलने ही वाले थे कि पीछे-पीछे परछाई की तरह घुम रहे गिरि बाबा बोल पड़े, ‘ आप हमारे महफिल में आ गये तो समझिए कि बसंत गिरि का नाच पक्का हो गया ।’ इसी बीच दारोगा जी ने उन्हें समझाते हुए कहा, ’ अब बनारस की लाजवंती और कोलकाता की मुक्तारानी के ठुमका पर मुजरा का माजा लूटीये। दारोगा जी के इस ठिठोली (मजाक) पर महफिल में जोरदार ठहाका लगा। तिवारी जी मुस्कुराते हुए मुजरा सुनने लगे।

‘ रात छोड़ गइले हो राजा सुतले सेजरिया पर ….’ हसीन और कमसीन मुक्तारानी के मिश्री घोलत स्वर लहरी पर सभी लोग मस्त थे। लाजवंती की तरह छुई मुई खूबसूरत नर्तकी के लाजबाव अदाकारी ने महफिल में नई जान फूंक दी थी। मुक्तारानी के एक-एक ठुमका और मुजरा के बोल पर दर्शक लट्टू की तरह नाच रहे थे। अचानक मुक्तारानी कुल्हा मटकाती कमर लचकाती दारोगा जी के आगे बैठ गई। दारोगा जी की आंखों में अपनी आंखें डाल कर इशारों इशारों में कुछ बातें करने लगी। दारोगा जी उसकी अदाकारी पर फिदा हो गये और जेब से एक हजार को एक नोट निकाल कर मुक्तारानी की चोली में खोंस दिया। साथ ही तिवारी जी के तरफ इशारा करते हुए नर्तकी के कान में कुछ फुसफुसाये।

लक्ष्मण तिवारी नर्तकी के रूप रंग और उसकी मस्तानी चाल पर मंत्र मुग्ध थे। उसकी सुघड़-सुडौल मांसल देह पर अपनी दींठ (नजर) गड़ाये हुए थे। नर्तकी के घूंटनों तक लहराते लहंगा, कांच कोइन की तरह लपलपाती कमर, गोटेदार चोली में कसमसाते बंद यौवन और उसकी तिरछी नजरों पर सभी घायल थे।

एकाएक मुक्तारानी ने अपनी घूंघट को दोनों हाथों की अंगुलियों से ऊपर उठाया, छतरी की तरह उसे ताना और नागिन की तरह बलखाती हुई तिवारी जी की तरफ पावटी काटती हुई आगे बढ़ी। वह लक्ष्मण तिवारी को छोड़कर एकाएक वसंती झोंका की तरह मेरे सिर पर अपनी घूंघट ओढा़ दिया और मुस्कराती हुई बोल पड़ी,‘ छन भंगुर जिनगी में जी भर के मजा लूट ल ए राजा जी ! फेरू मउका ना मिली....’ अर्थात हे राजा जी, क्षण भर की इस जिंदगी में भरपूर आनंद उठा लो, फिर मौका नहीं मिलेगा !

मुक्तारानी के इस हरकत पर मैं अकबका गया। शिक्षक का लावादा ओढ़ा मेरा मन मारे शर्म के तार-तार हो गया। अकस्मात आकाशीय बिजली की तरह सामने गिरी आफत पर कुछ समझ नहीं पाया कि क्या करें ! एकाएक मेरे कंठ को पाला मार गया। संकोच से मेरा दम घुटने लगा।

मेरी विचित्र दशा देखकर महफिल में जोरदार ठहाका लगा। मारे खुशी के दर्शक लोट-पोट हो गये। लेकिन तिवारी जी ने मेरी मनोदशा को तार (समझ) लिया और झट अपनी पॉकेट से एक हजार का एक नोट निकाल कर मुक्तारानी की ओर बढ़ा दिया। उसने नोट को झट से लपका और नाजो अदा के साथ शुक्रिया पेश करती हुई वहाँ से चली गई।

मुक्ता रानी के हटते ही मैंने राहत की सांस ली। अब अपने को सहज करने की कोशिश की। देखा कि नाच घर की खिड़की-दरवाजों पर खड़े मेरे स्कूल के लड़कें हुलक-हुलक (झाँक) कर नाच देखने की कोशिश कर रहे थे। उस वक्त मुझे यही लग रहा था कि सभी नर्तकी को छोड़, मुझे ही देख रहे हैं!

दूसरे दिन मैं स्कूल गया। चौथी घंटी में मेरा हिंदी का क्लास वर्ग 10 वीं में था। जैसे ही क्लास में जाकर हिंदी पढ़ाना शुरू किया, लड़के आपस में शोर-गुल करने लगे। कक्षा की शांति धीरे धीरे भंग होने लगी। पीछे बैठे लड़कें कुछ ज्यादा ही शोर मचा रहे थे। बच्चों से वर्ग में शांति बनाये रखने की अपील की, थोड़ी देर शांति के बाद पुन:वही स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। जब क्लास में फिर अशांति होने लगी तो मैंने उन्हें ऊंची आवाज में डांटा।

‘ क्यों इतना शोर मचा रहे हो, कोई बात है क्या ? ’

‘ हाँ सर... हाँ सर.... ’ पिछली पंक्ति से मनोज खड़ा होकर कुछ कहना चाहा।

‘बोलो, क्या पूछना है?’ मैंने अपने अंदर की खीझ पर काबू पाते हुए उससे पूछा।

‘ सर, राजेश आपसे कुछ प्रश्न करना चाह रहा है।’ मनोज ने राजेश का नाम उछाला।

राजेश का नाम आते ही वर्ग में शांति छा गई। वह किसी राजकुमार की तरह अपनी सीट से उठा और पूरे क्लास में अपनी नजरें दौड़ाई। इस दौरान दोनों हाथ उठाकर अपने बालों को अंगुलियाँ डालकर इंतमिनान से कंघी किया। उसके बाद मुझे किसी छुट भैया नेता की तरह घुरा। उसकी इस अशिष्टता पर मेरा तन-मन और आक्रोश से भर गया। वह उस क्षेत्र के विधायक का पुत्र था। इसलिए डांट-फटकर नहीं कर सका। अपना मन मसोसकर रह गया और उससे कहा,

‘ हाँ-हाँ पूछो राजेश, क्या है प्रश्न तुम्हारा ? ’

‘ सर, ‘मुजरा’ का संधि विच्छेद क्या होता है ?’

राजेश का इतना पूछना था कि क्लास में जोरदार ठहाका लगा। देर तक सभी हंसते रहे और मैं उनकी बुद्धिसम्मत व्यंग्य वाणी पर किंकर्तव्यविमूढ था।

….....................................

नोट- भोजपुरी कहानी ‘मुजरा ’ का प्रकाशन वर्ष 2010 में भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका पटना, अंक-सितंबर-अक्तूबर में हुआ था।

अनुवाद- भोजपुरी कहानी ‘मुजरा’ का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद लेखिका तुलसी देवी तिवारी ने वर्ष 2012 में की थी, जिसका प्रकाशन छत्तीसगढ़ी भाषा की पत्रिका ‘ लोकाक्षर ’ में हुआ था

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें