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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 88,जुलाई(प्रथम), 2020

ज़माना खराब है

श्लेष चन्द्राकर

श्रीवास्तव फैमिली ने घर के पीछे एक छोटी सी बाड़ी लगा रखी थी। मोहल्ले वालों से बच जाने पर जिसमें से थोड़ी बहुत सब्जियाँ मिल जाया करती थी। बाड़ी में मोहल्ले वाले अपने घर का कचरा उनसे नजर बचाकर फेंक देते थे। इस बात से वे लोग परेशान थे। आज जब श्रीवास्तव दंपति बाड़ी देखने के लिए गए तो फिर वही हुआ था।

मिसेज श्रीवास्तव बिफर पड़ी - ‘मोहल्लें वाले सुधरने वाले नहीं, आप कुछ कठोर कदम उठाईए। आज फिर अपने घर का कचरा फेंका हैं उन लोगों ने।'

मिस्टर श्रीवास्तव - ’कई बार बोल चुका हूँ, लेकिन ये लोग समझने वाले नहीं हैं।'

मिसेज श्रीवास्तव - ‘तो क्या हाथ में हाथ धरे बैठें रहेंगे?'

मिस्टर श्रीवास्तव ने ‘नहीं।' कहा और बाड़ी का कचरा साफ करने लगे। यह देखकर मिसेज श्रीवास्तव ने गुस्से से कहा- ‘आप तो खुद गंदगी साफ करने में लग गए।'

मिस्टर श्रीवास्तव- ‘अगर उन लोगों में ज़रा भी शर्मो हया बची होगी तो, मुझे ऐसा करते देख कल से कचरा नहीं फेंकेंगे।'

मिसेज श्रीवास्तव - ‘आप भी ना कहाँ-कहाँ का दिमाग लगाते है। आप कुछ नहीं करेंगे तो मैं ही सबको आज चेतावनी दे आऊँगी।'

मिस्टर श्रीवास्तव - ‘अरी! भाग्यवान भूलकर भी ऐसा मत करना नहीं तो कल से बाड़ी में दुगुना-तिगुना कचरा दिखेगा। ज़माना खराब है। आजकल किसी को कुछ कहो तो दुश्मनी ठान लेते हैं। और जिस कार्य के लिए मना करो, तो उस कार्य और अधिक करने लगते हैं।'

मिसेज श्रीवास्तव को बात समझ में आ गई थी, वह भी कचरा साफ करने लगी।


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