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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 88,जुलाई(प्रथम), 2020

नापाक रिश्ता

डॉ. सदानंद पॉल

बहन ने धर्मभाई के कलाई पर राखी बाँधी, चन्दन की टीका लगाई, आरती उतारी और महिमा-मंडित, प्रेम-पुष्पित 'कर' से मिठाई खिलाई । न परिचय, न पाती....। अनाथ को बहन ने धर्मभाई बनाया था , अपनी छत्रच्छाया में उन्हें भरकोशिश पढ़ाया-लिखाया और 'चार्टर्ड - अकाउंटेंट' जैसे 'जॉब' दिलवायी.... आमदनी की अम्बार सजी । प्रथम अवकाश में धर्मभाई सावन पूर्णिमा से एक दिन पूर्व बहन के पास आया था। ××× थी तो पूर्णिमा की रात.... और रात में.... कमरे में अँधेरे होने का फायदा उठाया -- "म... मैं.... मैं..... कंचन हूँ, रमण ! .....तुम्हारी दीदी....कहीं बहन के साथ.... ऐसी नीच हरकतें.....।" तब तक दरिंदे भाई ने माँ-तुल्य धर्मबहन की चोली और चुनरी को उनकी देह से अलग कर दिया था तथा अपनी कामवासना से उस पवित्र रिश्ते को कलंकित किया । ××× बहन ने भाई को सबकुछ दी और बदले में भाई ने उस देवी को कोठेवाली बना दिया, जिनका नाम कंचन बाई है । हाँ, कंचन आज वेश्या है, जिनकी हर रात नए-नए ग्राहकों के बाँहों में बीतती है।


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