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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 88,जुलाई(प्रथम), 2020

क्या लेना-देना!

डॉ प्रदीप उपाध्याय

आज डॉ वरुण और डॉ सूरज एक गंभीर विषय पर चर्चारत थे।इसी दौरान मैं भी वहाँ पहुँचा मैंने देखा डॉ वरुण बहुत गुस्से में थे और डॉ सूरज से बोल रहे थे कि -" सूरज देश की वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्थाओं को लेकर मुझे अत्यंत दुख होता है और गुस्सा भी आता है ।कितनी विड़ंबनापूर्ण स्थिति है कि बड़े पद पर पहुँचने के बाद आदमी और ज्यादा स्वार्थी और अहंकारी हो जाता है ।"

डॉ सूरज ने पूछा-" ऐसा क्यों कह रहे हो ।"

डॉ वरूण बोले-"एक छोटा सा उदाहरण ही काफी है यह बात समझने के लिए।अभी हाल ही में जिला अस्पताल में कोरोना पीड़ित मरीजों के लिए वेंटीलेटर की खरीदी में बड़ा घोटाला हुआ और जाँच में सभी बड़े लोगों को बचाते हुए बाबूओं को दोषी बताकर उन्हें छोटा-मोटा दण्ड देकर मामले की लीपापोती कर दी गई।जबकि खरीदी की कार्यवाही ऊपर के स्तर पर और उन्हीं के निर्णय अनुसार होती है। कोरोना महामारी के इस दौर में भी जब देशभर में बहुसंख्य जन सहयोग करने में जुटे हैं वही ये भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी और कुछ डॉक्टर्स हमारा नाम बदनाम करने में लगे हैं। परंतु क्या करें यहाँ सब चलता है।"

यह सुनकर डॉ सूरज कुछ देर चुप रहे ,फिर बोले -" हम कर भी क्या सकते हैं हमें तो अपनी ड्यूटी करनी ही होगी हम अपने स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से जो अच्छा कर सकते हैं वही करने का प्रयास करते हैं ।"

डॉ वरुण ने भड़कते हुए कहा-" संसाधनों की क्या बात करते हो ड्यूटी पर पहनने वाली पी पी ई किट भी कितनी घटिया क्वालिटी की हैं ।सफाई कर्मचारियों को सफाई करते समय ना तो मास्क दिए जाते हैं न ग्लब्स दिए जाते हैं। ऐसा ही ओपीडी में बैठने वाले डॉक्टरों के साथ किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में संक्रमण और फैलेगा ।यह तो तकनीकी बात है लेकिन इन अधिकारियों का पेट कब भरेगा ?

डॉ वरुण और डॉ सूरज परेशान हाल आगे कुछ बिना बोले चिंता में डूबे रहे। मैं उनके चेहरे के भावों को पढ़ता हुआ वहाँ से चला आया और सोचने लगा कि एक वह डॉक्टर है जो उपकरणों और संसाधनों की खरीद में घोटाले कर रहा है और गलत नीतियों को मान रहा हैं दूसरी ओर एक ये डॉक्टर हैं जो इस बात से दुखी हैं लेकिन फिर भी कर्तव्यनिष्ठ बने रहकर जानजोखिम में डालकर सेवाएँ दे रहे हैं।

लेकिन मुझे इन सबसे क्या लेना-देना यह सोचकर मैं वहाँ से चला आया।


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