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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 88,जुलाई(प्रथम), 2020

असली शिकारी

देवी नागरानी

हमारे पड़ोसी श्री बसंत जी अपनी तेरह महीने की नाती को स्ट्रोलर में लेकर घर से बाहर आए और मुझे सामने हरियाली के आस पास टहलते देखकर कहाः "नमस्कार बहन जी"

"नमस्कार भाई साहब. आज नन्हें शहज़ादे के साथ सैर हो रही है क्या?"

" हाँ यह तो है पर एक कारण इसका और भी है. इस नन्हें शिकारी से अंदर बैठे महमानों और घरवालों को बचाने का यही एक तरीका है."

"वह कैसे ?" मैंने अनायास पूछ लिया.

" अजी क्या बताऊँ , सब खाना खा रहे हैं, और यह किसीको एक निवाला खाने नहीं देता. किसी की थाली पर, तो किसी के हाथ के निवाले पर झपट पड़ता है और................!."

अभी उनकी बात ख़त्म ही नहीं हुई कि एक कौआ जाने किन ऊँचाइयों से नीचे उतरा और बच्चे के हाथ में जो बिस्किट था, झपट कर अपनी चोंच में ले उडा़. मैंने उड़ते हुए पक्षी की ओर निहारते हुए कहा.." बसंत जी, देखिये तो असली शिकारी कौन है?" और वे कुछ समझ कर मुस्कराये और फिर ठहाका मारकर हंस पड़े.


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