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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



लघु से दीर्घ तक पुस्तक की समीक्षा


समीक्षक: सतविन्द्र कुमार राणा
लेखिका: रश्मि सिन्हा


सामाजिक पहलुओं को छूता कथा संग्रह ‘लघु से दीर्घ तक’ --- एक शिक्षित गृहणी अपनी व्यस्त दिनचर्या से पढ़ने का समय निकालती है। ऐसे ही पढ़ते-पढ़ते वह कलम थाम कर लेखन की ओर अग्रसर होती है। और कई कथाएँ, कविताएँ व व्यंग्य उसकी कलम से प्रकट होते हैं। ऐसी ही लेखिका हैं श्रीमती रश्मि सिन्हा और अभी जिक्र है उनके नव-प्रकाशित कथा-संग्रह ‘लघु से दीर्घ तक’ का। छोटी-बड़ी कुल सत्ताईस कथाएँ एवं नौ व्यंग्य इस संग्रह में हैं। सामाजिक चेतना की जागृति की जिम्मेदारी साहित्यकार के कंधों पर होती है। इसको निभाने के लिए एक कथाकार को अपनी कथाओं के कलात्मक पक्ष को सुदृढ करना होता है और उन्हें रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना होता है। तभी कथाओं की घटनाएँ और पात्र पाठक पर अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ पाते हैं और कथाकार अपनी जिम्मेदारी का सही से निर्वहन कर पाता है। इस संग्रह के संदर्भ में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि लेखिका ऐसा करने में सफल होती प्रतीत हो रही हैं। विविध विषयों को आधार बनाकर अच्छी कथाओं का सृजन लेखिका द्वारा हुआ है। कथाएं ‘दोस्ती’ और ‘इंतज़ार’ युवा सन्तान की व्यस्तता के कारण एकाकी जीवन से त्रस्त वृद्धों के दर्द को प्रकट करती हैं। ‘बेग़ैरत’, ‘बोल्ड’, ‘नीरस’, ‘रधिया अछूत नहीं’, ‘स्पर्श’, ‘डिजिटल जवाब’ ऐसी कथाएं हैं जिनमें पुरुष के महिलाओं के प्रति नजरिये को उभारा है। इनमें पुरुष के पर स्त्री के प्रति नकारात्मक व सकारात्मक दोनों पक्षों को ईमानदारी से जाहिर किया गया है। ‘सपना’ व ‘गैंगरेप’ में एक ही विषय के दो पहलुओं से सामना कराती हैं। एक सुखद स्वप्न और दूसरी भयानक यथार्थ को सामने लाती है। ‘स्विट्ज़रलैंड’ शहरों में बस चुके ग्रामीण युवाओं तक ग्राम्य जीवन की सुखद यादें लेकर जाती है। अनोखे अंदाज में लिखी गयी ‘बेहरम डॉ की डायरी के पन्ने’ एवं ‘एक सावित्री ये भी’ में असाध्य बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पर स्नेहीजन की हताशा और अंत में उनके अंतिम सच के आगे दुखित समर्पण का चित्रण है। ‘जाल’, ‘मन का सच’, ‘सबूत’, ‘यात्रा, ‘उल्टा तवा’ मानवीय मनोविज्ञान एवं व्यक्तित्व के पहलुओं पर चिंतन प्रस्तुत करती हैं। ‘आदर्श’, ‘रिक्शावाला’, ‘आकर्षण क्रश’ व ‘मित्रता’ सकारात्मक सन्देशप्रद कथाएँ हैं। ‘दीवार’ व ‘कसाई बाड़ा’ मन को झकझोरने वाली रचनाएँ हैं। ‘कसाई बाड़ा’ की प्रतीकात्मक शैली पाठक को मुग्ध करती है। कुछेक चूकों को छोड़कर श्रीमती सिन्हा की भाषा अत्यंत सरल, आम-बोलचाल की व सधी हुई भाषा है, जिससे पाठक सीधे बंधा चला जाता है। सभी कथाएँ एवं व्यंग्य रोचक, हृदय को छूने वाले एवं चिंतनपरक हैं।

पुस्तक: लघु से दीर्घ तक
लेखिका: श्रीमती रश्मि सिन्हा
प्रकाशक: वनिका पब्लिकेशन, बिजनौर
मूल्य: ₹150 (पेपर बैक कवर में)।


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