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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



तन्हाईयों में तलाशता हूँ


नरेश गुर्जर


     
जो मिलते नहीं मुझको महफिलों में
वो चंद पल खुशियों के तन्हाईयों में तलाशता हूँ

बैठ जाता हूँ अकेला सबसे दूर कहीं पर
खुद से ही बातें करके खूद को बहलाता हूँ

पूछता हूँ कुछ सवाल अपने आप से मैं
अपने आप में ही उनके जवाब ढूंढता हूँ

जो मिलते नहीं मुझको महफिलों में
वो चंद पल खुशियों के तन्हाईयों में तलाशता हूँ

गुजरता है जब कोई वक्त तो बहुत सी यादें बनती हैं
उन यादों के शीशों में खूद को निहारता हूँ

दरारें पड़ी हुई है रिश्तों की दीवारों में
उन दरारों से रिसते हुए खूद को सम्भालता हूँ

जो मिलते नहीं मुझको महफिलों में
वो चंद पल खुशियों के तन्हाईयों में तलाशता हूँ

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