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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



साहित्य शिक्षा और समाज


सुशील शर्मा


                                                          
शिक्षा, नैरन्तर्य और  विस्तार का बोध है। 
समाज के वैदुष्य और उसकी सहृदयता का शोध है। 

बहुभाषी समाज के स्मृति भंडार और भाषा-संस्कार 
साहित्य और शिक्षा इसको देते विस्तार। 

इतिहास के  सौहृदों की पर्युत्सुक करनेवाली स्मृति’
अतीत के पन्नों में लिपटी दुःखद दारुण विस्मृति 


समाज के नियन्ता या मूल्यों का चरम निर्णायक है 
साहित्य आविर्भूत समाज का प्रतिस्थापक है । 

समाज को बदलने में शिक्षा व साहित्य का योग होता है
साहित्यिक कर्म ,सांस्कृतिक कर्म का संयोग होता है। 

कल्पना सर्जन का आधार है। 
साहित्य समाज का व्यवहार है। 

साहित्य , अस्मिता की पहचान कराता है। 
सामूहिक, सामाजिक, व्यक्तिगत आधान कराता है ।

संस्कृतियाँ और समाज लगातार बदलते हैं। 
शिक्षा और साहित्य के अनुसार चलते हैं। 

परिवर्तन की कामना, योग्यता ,शिक्षा का आधार है। 
साहित्य की आत्म-चेतना का सहज व्यवहार है।

मानव संस्कृति और मानव समाज की परिकल्पनाएं।  
संवेदनाएं और सम्प्रेषण की असीमित संभावनाएं। 

 साहित्य सर्जन का, एक कालातीत आयाम होता है। 
सच्चे रचनात्मक साहित्य का, यही पयाम होता है। 


साहित्य समाज को और संस्कृति को बदलता है। 
इसलिए वह नए और अपूर्व-कल्पित जीवन में ढलता है। 

शिक्षा का उन्मेष और आविष्कार समाज है। 
शिक्षा ,साहित्य की शंखघोष आवाज़ है। 

हमारे युगीन संवेदन और समूचे संस्कार का परिणाम हैं। 
शिक्षा और साहित्य सामाजिक संचेतना के आयाम हैं। 

श्रेष्ठ साहित्य समाज को बदलता नहीं, उसे मुक्त करता है। 
देश ,काल ,और मानवीय वृतियों को संस्कार युक्त करता है। 
 

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