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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



ईद मुबारक


सुशील शर्मा


                                                          
ईद का चांद आज,
मेरी छत पर मुस्कुराया।
धीरे से मेरे कमरे की,
खिड़की पर उतर आया।

बोला मुझसे क्यों,
मेरा दीदार नही करोगे।
मेरी अदा पर प्यार का,
इजहार नही करोगे।

आज मेरे सिर पर तुम्हे,
मुस्लिम की टोपी नजर आती है।
पर शरद पूर्णिमा भी मुझे,
चंदन तिलक लगाती है।

मेरे लिए तो दोनों,
बराबर के त्यौहार है।
मेरा न हिन्दू सा, 
न मुस्लिम सा व्यवहार है।

ईद की मुबारक, 
में भी मुस्कुराता हूँ।
शरद पूर्णिमा में,
प्रेम का रस बरसाता हूँ।

नफरत की आंधियां, 
दिल से नदारत हों।
मेरी तरफ से सभी को, 
ईदें मुबारक हों।

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