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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



पहली बरसात


सुशील शर्मा


                                                          
प्रथम बूंद वर्षा की जब 
अंगों पर साकार हुई।
जैसे चुम्बन लिए प्रेयसी,
अधरों पर असवार हुई।

छन छन करती बूंदे,
जलबिंदु की मालाएं।
भरतनाट्यम करती जैसे,
छोटी छोटी बालाएं।

घनन घनन करते है बादल
ज्यों जीवन का शोर सखे।
टप टप करती बूंदे नाचें
ज्यों जंगल में मोर सखे।

आज प्रथम बारिश में भीगे,
सुख का वो आधार सखे।
जलती सी धरती पर जैसे,
शीतल जल की धार सखे।

छपक छपक बच्चे जब नाचें,
सड़कों और चौबारों पर।
वर्षा की धुँधयाली छाई,
गांवों बीच बाजारों पर।

सूखे ताल तलैय्या देखो,
भर गए मेघ के पानी से।
 रीते रीते से तन मन में,
जैसे आये जोश जवानी से।

ठंडा सा अहसास दिलाती 
देखो बारिश मुस्काई। 
चाँद टहलता बादल ऊपर 
तारे खेलें छुपा छुपाई। 

कोयल बोली कुहुक कुहुक
दादुर ने राग अलापा है।
चिड़ियों की चीं चीं चूं चूँ से
गूंजा सुनसान इलाका है।

सूखे ठूंठों पर भी अब देखो,
नई कोपलें इतराईं।
जैसे नीरस बूढ़े जीवन में,
आशा की कलियां मुस्काईं।

हँसते हुए पेड़ पौधे हैं,
जैसे बच्चे मुस्काते। 
बारिश की नन्ही बूंदों में,
हिलते डुलते इतराते। 

अंदर के बचपन ने देखो,
फिर से ली अंगड़ाई है। 
बारिश की बूंदों से देखो,
कर ली मैंने लड़ाई है। 

बच्चा बन पानी में उछला,
उमर छोड़ दी गलियों में। 
सड़क के बच्चों संग मैं कूदा,
कीचड़ वाली नलियों में।  
  

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