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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



सुनो,सुनो.....


शुचि 'भवि'


                                                          
बचपन से ही यह सुन रहे
पढ़ रहे और कह भी रहे
नारी सर्वत्र पूज्यते
माँ के पाँव में जन्नत
स्त्री है तो घर है.....

मैं भी तो
यही बातें सुन
वैसे ही सपने बुन
बड़ी हुई हूँ न!!!!

सुनो तो,
पर परियों की
कहानियों जैसे
ये सब भी जो
मैंने सुना था
सिर्फ़ किताबी ही
था क्या??

सुनो न
अब तो मैं बड़ी हूँ
अब तो बता दो न
क्या है मेरा सच
वो
जो सुनते बड़ी हुई हूँ?
या ये
जो अब हर घर
हर नुक्कड़
हर टीवी चैनल
हर अख़बार
देख-पढ़ रही हूँ???

सुनो भी
तुम बता दो न अब
मुझे भी तो
मेरा सच
कि आज भी 
तुम पर ही तो है
विश्वास मुझे,,,,
न जाने क्यूँ,,,???

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