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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



मैंने देखा पहली बार


रामदयाल रोहज


                                                         
मैं जब जूनागढ़ देखने गया 
मैंने देखा पहली बार
मेन गेट पर बैठा हुआ था एक चित्रकार
मेरे कदम स्वतः ही रुक गये
इधर उधर बिखरे पड़े कोरे कागज
एक कोरे कागज पर उसने बोए बीज
अमर फलों के
अब रंगों के जल से सींचा
दिल की थैली से डाला अनुराग खाद
और उसकी कलम ने                        
कोमल अँगुलियों से सहलाकर दिया 
माता जैसा प्यार
देखते ही देखते खिल उठा उपवन
मेरी नजरों के मोर जा बैठे
उन हरे भरे दरखतों की डालियों पर
बाहर धू धू कर चल रही है गर्म हवा
लेकिन यहाँ तो वसंत है
प्रकृति के कर्मचारी अपने काम में व्यस्त है
मेरा मन मरुस्थल सा वीरान पड़ा था
कुछ समय से 
अब मन का वातावरण ठंडा हुआ 
क्योंकि उपवन से आ रही है 
ठंडी तरोताजा हवा
उसमें होने लगी विचारों की बारिश
और दबे हुए बीज होने लगे अंकुरित                                                    

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