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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



परिवर्तन


पुष्पा मेहरा


                                                       
बदल जाता है रूप 
बदल जाता है रंग 
बदल जाते हैं शौक़
बदल जाती हैं आदतें 
बदल जाती है नियति
बदल जाता है नियत 
बदल जाता है भाग्य 
पर बदलता नहीं रंग 
रक्त का,जो होता है लाल 
बदलता नहीं
आत्मा का स्वरूप –
उसका दिव्य ज्योति रूप 
बदलती ना कभी गूँज 
अनहद नाद की ,
शून्य तो  शून्य में 
जा मिलेगा      
माटी को माटी मे 
समाना ही होगा   
परिवर्तन 
गति क्रम 
समझाता है ,परिवर्तन 
हर युग में प्रति पल 
होता है 
फ़िर ऐ मन !
यह कैसा हाहाकार है 
यह कैसा स्वत्व –राग है 
जो बाँध रहा है
तुम्हे –हमें 
अहं-मोह जाल में 
जो डोल रहे सब
इधर –उधर 
रक्त – पिपासु बने 
उजाड़ रहे धरती को 
छी रहे ममता की 
कोख को !!
लगता है  
ख़त्म हो गई है 
क़लम की ताक़त 
सो गई है आवाज़ 
अन्तश्चेतना की ,
देखो तो –गुनो तो 
पूरब से सूरज निकलता 
सारे जग को
रोशन करता है 
जाते –जाते 
पश्चिम दिशा को 
अनुराग रंग दे 
साँझ की झोली में 
खुशियाँ भर जाता है !!
अस्त को अस्ति बता
आता और जाता है |   
परिवर्तन को 
आवर्तन बता
बिदाई लेता  
लौट-लौट आता है 
यह प्रकृति का 
प्रेम बंधन,उसका 
आपसी रिश्तों से जुड़ाव

जन –जन का 
प्रेरणा-श्रोत बना  
हर मन मुग्ध करता है, 
तो क्यों न हम
मूक प्रकृति की प्रकृति को 
अपने जीवन में ढाल लें 
एक दूसरे के पूरक –
सहायक बन
धरती को स्वर्ग बनाएँ 
आरोपों –प्रत्यारोपों से परे
दूसरों की गलतियों से सीख ले 
अपनी गलतियाँ सुधार लें |    

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