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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



कैसे करें , विश्वास बताओ


कवि जसवंत लाल खटीक


  
अब नहीं , रहा विश्वास ,
सब के सब हैं , धोखेबाज़ ।
मुँह में राम , बगल में छुरी ,
गिराते , एक दूजे पे गाज़ ।।
कैसे करें , विश्वास ,बताओ ,
छल-कपट , का साया है ।
चाहे , कुछ भी हो जाए पर ,
चाहिये , सबको माया है ।।
भाई-भाई , आपस में लड़ते ,
विश्वास , को ताक में रखकर ।
जमीन , जायदाद के खातिर ,
तलवारें , चलती है जमकर ।।
पराये की बात , तुम छोड़ो  ,
अब , अपने का , विश्वास नहीं ।
रिश्तों को , शर्मसार करते ,
आती , इनको लाज नहीं ।।
भगवान , के ऊपर से भी ,
विश्वास , देखो उठ गया ।
काम ना हो तो , बदल लेते  ,
कहते , भगवान रूठ गया ।।
जानवर पर है , फिर भी विश्वास ,
पर इंसान से , विश्वास उठ गया ।
अब तो बचा , राज बेईमानों का ,
हरिशचन्द्र वाला , राज लुट गया ।।
विश्वास बिचारा , इस कलयुग में ,
घुट - घुट , करके मर रहा ।
" जसवंत " देखो , पगला गया ,
विश्वास , की बातें कर रहा ।।

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