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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



गरीबी


डॉ० अनिल चड्डा


 
झुग्गियों में जन्मी
कीचड़ में पली
फुटपाथ पर 
थी मैं खेली 
मेरा दर्द 
और नग्नता
छुपायें थी
दीवारें खपरैली
या फिर 
आकाश ही 
जानता था 
इनकी पहेली 
तुमने क्यों 
जगजाहिर कर दिया मुझे 
क्या मिला तुम्हे 
मेरी लुकी-छिपी 
अस्मिता, 
स्वाभिमान को बेच कर 
केवल कुछ अवार्ड
और 
ढेर सारा पैसा 
पर मैं तो 
फिर भी 
वहीँ की वहीँ हूँ 
तुम्हारे अवार्ड 
और पैसा तो 
मुझे 
ऊपर नहीं उठा सके 
मैं तो 
उसी अवस्था में 
सिसकती
बिलखती 
रोती ही रही 
कल को शायद 
फिर 
कोई दुनिया में 
मेरा सौदा करेगा 
और कुछ 
वाहवाही लूट लेगा 
पर मैं तो 
सड़क पर 
फुटपाथ पर 
किसी झुग्गी 
या 
कीचड़ में ही 
लोट-पोट
होती रहूँगी
और 
लुटती ही रहूँगी!
लुटती ही रहूँगी!!

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