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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



जूठे मन


अभिषेक कांत पाण्डेय


 
कुछ हिस्सा जीवन
बदरंग आदमी
सोच
कृत्य
राजधानी
लगातार बार बार
जंगल में तब्दील
सड़क से संसद।
गलत गलत
चश्मे वाली आखों से
देसी वादे
उतरे -नहीं
हज़म सब
ख़त्म खेल।
पुराने मन में
नयापन
नहीं नहीं
भ्रम समझ
वही राजधानी
जंगल
सड़क से संसद
चेहरे मोहरे
बदरंग आदमी
बहुरे छत,
हत -प्रत
बुझा मन
वहीं चश्मे वाली नंगी ऑंखें
लुटेरा
सीधा-साधा
करोडों खाली पेट
तैरती दुगनी आंखे
उठाते इतने सिर।
कहीं अरबों की डकार
बडा  थैला
असरदार मुखिया
टाले  नहीं
हजारो घोटाले।

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