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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



बहुत याद आता है


योगेन्द्र कुमार निषाद


                                                            
बहुत याद आता है, वो बचपन का जमाना।
गिल्ली-डंडा और ...मिलकर पतंग उड़ाना।
                   बहुत याद आता है वो बचपन का जमाना।

उंगलियों को दांतो से ,दबा  एक दूसरे को 
छोटी-छोटी बातों पर ...रूठना औ मनाना ।
                   बहुत याद आता है वो बचपन का जमाना।

भरी दोपहरी में , घर से भागकर सब यार ,
आमराई पे जा मीठे आम का लुफ़्त उठाना ।
                   बहुत याद आता है वो बचपन का जमाना।

शाम होते ही लुका छिपी का खेल शुरू...,
रात में दादी के गोद मे कहानियों का ताना-बाना ।
                   बहुत याद आता है वो बचपन का जमाना।
 

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