Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



मुक्त विचरता हूँ


राजेन्द्र वर्मा


                                                        
बन्धु, मुझे मत बाँधो, मेरा कोई ठौर नहीं;
मैं हूँ मुक्त गगन का वासी,
मुक्त विचरता हूँ ।
 
मैं सरि से संपृक्त रहूँ, या रहूँ बादलों में 
मलयानिल के मध्य रहूँ, या रहूँ मरुथलों में
चाहे जहाँ रहूँ, लेकिन रहता हूँ अन्तस में,
मैं हूँ पवन झकोरा,
सबमें श्वासें भरता हूँ ।
 
दनुज-देव की संस्कृतियों में भेद नहीं पाला
प्राणिमात्र के श्वासों की मैं फेर रहा माला
संसृति में चर-अचर, सभी तो मेरे अपने हैं,  
उनके हित के लिए  रूप
होत्रक का धरता हूँ ।
 
पंचतत्त्व का पिंजरा मुझको बाँध नहीं पाता
यद्यपि मेरा जन्म-जन्म का है उससे नाता
एक दिवस पिंजरा तजकर जब पंछी उड़ जाता,
किसी स्वजन के हाथों
अग्नि प्रज्वलित करता हूँ ।।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें