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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



आज नहीं तो कल


राजेन्द्र वर्मा


                                                         
समय बदलता है, बदलेगा आज नहीं तो कल,
क्षमा और करुणा के आगे
हारेगा ही छल !
 
माना, अँधियारा जगता है
अपनों से भी डर लगता है
लेकिन तनिक सोच तो रे मन !
डूबा सूरज फिर उगता है
गहन निराशा में भी पलता
आशा का संबल ।  
 
सागर का विशाल तन-मन है
किन्तु नदी का अपना प्रण है
जीव-जन्तु को जीवन देकर
पूरा करती महामिलन है
आओ हम भी दो पल जी लें,
ज्यों सरिता का जल ।          
कोई छोटा-बड़ा नहीं है
लेकिन मन में गाँठ कहीं है
बड़ा वही जो छोटा बनता
जहाँ समर्पण,  प्रेम वहीं है
प्रेम-भाव से मिल बैठेंगे,
निकलेगा कुछ हल ।।

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