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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



क्यों मन के तुरंग दौड़ाए ?


डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी


 
क्यों ऊसर जमीन पर मैंने, आशाओं के बीज बहाए ?
मायामय  कुरंग के पीछे, क्यों मन के  तुरंग  दौड़ाए ?

घोर अमा थी ,तम गहरा था ।
उर पट पे भय का पहरा था ।
क्यों ऐसी विपरीत दशा में 
विधु दर्शन को मन ठहरा था ।

हाय भला इस हठी हृदय के,बहकावे में हम क्यों आये ?
क्यों ऊसर...................................................

फिर बसंत  सेमल  बौराए।
डाल डाल पे कुसुम सुहाए ।
देख अरुण शोभा फूलों की,
दूर- दूर  से  पक्षी  आये ।

गंध ,स्वाद से मुक्त पुष्प को देख,बहुत ही खग पछताये ।
क्यों ऊसर...............................................

आस्तीन का  साँप  आदमी ।
पाप से बड़ा  पाप  आदमी ।
सारे जीव चर अचर व्याकुल,
सिद्ध हुआ अभिशाप आदमी ।

विध्वंसक इंसान देखकर, नित्य यह धरा अश्रु बहाये ।
क्यों ऊसर .............................................


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