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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



ललित निबंध
अब ऐसा मजा क्यों नहीं रहा


लेखक: श्री विनेश अंताणी
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


खाकी निकर और सफ़ेद कमीज पहनकर छब्बीस जनवरी या पंद्रहवीं अगस्त की सुबह गाँव में निकली प्रभातफेरी में गला फाड़ फाड़कर `भारतमाता की जय’,`मा`त्मा गाँधी की जय’, के नारे लगाते हुए सारे गाँव में घुमते और सावधान की मुद्रा में खड़े होकर `जनगणमन अधिनायक जय हे’ गाते थे उन दिनों की यह बात है. वे दिन भरपूर श्रद्धा के दिन थे. तब `भारत भाग्य विधाता; के सन्दर्भ में प्रश्न उठते नहीं थे.टेलिफोन या रेडियो भी घर में पहुंचे नहीं थे.मेरे घर में अभी तो लालटेन जलते थे.शाम होने पर माँ तीन-चार लालटेन लेकर आँगन में बैठती,कैंची से बाती को कतरती थी, कांच का गोला चूल्हे की राख से साफ करती थी.घासतेल भरती थी.दियाबत्ती की वेला होने पर लालटेन जलाकर रसोई और भोजन करने के कमरे के बीच दरवाजे की चौखट पर लटका देती थी.उन दिनों स्विच दबाते ही फट से लाईट चालू या बंद हो जाने के दिन नहीं थे.नल खोलते ही पानी आये ऐसा भी वक्त नहीं था.खारे-मीठे पानी के कूएँ पर पानी भरने के लिए जाना पड़ता था.बाद में कुएँ में से सिंचता जा रहा रस्सा माँ के पैरों के पास गोल गोल लिपटते जाते हुए देखने में बड़ा मजा आता था.

अब ऐसा मजा क्यों नहीं आ रहा? अब कितना सारा हस्तामलक हो गया है.बैंक से डी.डी.बनवाने के लिए दो-दो बार बैंक के चक्कर काटने पड़ते थे.बैंकवाले बड़े बड़े लेजर उल्टापल्टाकर शाम होने तक थककर चूर हो जाते थे.जूते सिलवाने के लिए अपनी पसंद के मोची की दुकान जाना पड़ता था.उसके छोटे से स्टूल पर हम बैठे होते हैं. दुकान से चमड़े की गंध आती रहती है.मोचीकाका कागज पर पैर रखवाकर पेन्सिल से नाप लेते और पूछते कि डोरीवाले(Laces) या सादे? बापुजी कहते थे,डोरीवाले नहीं,सादा.यदि डोरी नहीं बांधने कहीं चलते चलते गिर सकता है.नवरात्रि से पूर्व हम सब घरवाले मिलकर एकसाथ कपडे की दुकान पर जाकर एकसाल भर चले उतने कपडों का जत्था खरीद लेते थे.थान पर थान खुलते जाते और कपड़ा ब्यौंतता जाता.गड्डी बगल में रखी जाती थी.थान से अलग ही किस्म की गंध आती थी.अब तो तैयार कपडे लेने के लिए दुकान तक नहीं जाओ तो भी चलेगा.ओनलाईन सबकुछ मिल जाता है.फिर भी पहले जैसा मजा नहीं आता.

मेरे गाँव की दुकानों की जुदा ही तड़क-भड़क थी.दालिया(छिलकारहित भुने हुए चने की दाल)(Baked Gram)वाले चाचा अपनी छोटी सी दुकान में तवे पर चने सेंकते थे.खारीसिंग(मूंगफली के दाने) के सेंके जाने की सुगंध उठती थी. सुनारों की दुकानों में उनके पूर्वजों के चित्र देखकर भी मजा आता था.चित्र के निचे लिखा होता है:सोनी फलाना फलाना. सुंदर और आकर्षक कपडे पहनकर कुर्सी पर बैठकर खिंचवाई हुई तस्वीर से `ज्वाज्वल्यमान’ शब्द का अर्थ कक्षा में बिना पढ़े ही समझ में आ जाता था.हरएक व्यापारी अपने परिचित ग्राहक को चाय के लिए आग्रह करता था.चायवाला लड़का हाथ की उँगलियों में कप लटकाए आता और धातु की किटली से ऊँची धार करके कप भरता था.एक भी बूंद नीचे टपकती नहीं थी.ऐसी धार अब कहाँ?

कोई भी उत्सव गड़बड़ी का कारण बनता नहीं था.संगीत का मजा लेते थे.नवरात्रि का आगमन हो या सप्तमी-अष्टमी के दिन रास खेले जाते थे तब मात्र ढोल और स्त्री-पुरुषों के कंठ से सूरबद्ध गाये जा रहे रास-गरबा के शब्द और सूर में अपनत्व का अहसास होता था.कहीं भी कृत्रिमता अनुभव नहीं होती थी. समूह का एक हो जाना दिल से अनुभव किया जा सकता था.तब खचाखच भरा हुआ मानवसमूह भीड़ जैसा लगता नहीं था,उनके आरपार निकला जा सकता था.अब तो व्यक्ति अकेला हो तब भी भीड़ में भींचा जा रहा हो ऐसा खौफ सब की आँखों में झलकता है.गाँव का प्रत्येक व्यक्ति अपना लगता था.`रामराम’ कहे जाने पर सामने से बड़े हुलास के साथ `रामराम’ जवाब मिलता था.मोहल्ले में धोवन फेंकने के लिए आई स्त्रियाँ आराम से निंदा कर सकती थीं.अब सामने मिला हुआ व्यक्ति नया क्यों लगता है? बारिश होते ही बच्चे गली-मुहल्ले में दौड़ जाते थे.मदारी के आसपास मजमा लग जाता था.रामलीला के खेल रात-रातभर खेले जाते थे,फिरभी अब सोफे पर बैठकर आधा घंटा टी.वी. देखने पर जो थकावट अनुभव होती है ,वैसी थकन तब लगती नहीं थी.खुले आकाश का मजा ही कुछ और था.

एक दूसरे के गले में बाहें डाले हाथ मिलाकर मित्रता का सुखानंद मानाने का भरपूर सुख था.स्पर्श द्वारा भी बहुत कुछ कहा जा सकता है.रूठने का भी अपना एक मजा था.बिल्ला करने का भी आनंद था.अब फेसबुक में फ्रेंड्स कि तादाद बढ़ गई है,लेकिन मित्र को छूने का सुख क्यूं नहीं मिल रहा?जीवन बहुत सरल हो गया है,फिरभी उलझा उलझा सा क्यों लगता है?


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