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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



गुजराती कहानी
श्रद्धांजलि सभा


लेखक: लेखक: केशुभाई देसाईं
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


लीलाचंद पटेल शामियाने के एक कोने में झुलते हुए उनकी श्रद्धांजलिसभा में भाषणबाजी कर रहे नेताओं को बड़े ध्यान से सुन रहे हैं। कुछ ऐसी गोपनीय बातें पहली बार ही सुनकर वे दंग रह गये। क्या? सचमुच?–उनके विस्फारित हुए मुख से उदगार भी निकल पड़े। वैसे वे पृथ्वीलोक के अभेद्य वातावरण में पिघल गए। जिस प्रकार, उनकी सूक्ष्मदेह में उपस्थिति होने पर भी वहां जमा हुई भीड़ उनको देख नहीं सकती थी,उसी प्रकार उनकी आवाज भी नहीं सुन सकती थी तथापि सदेह इन्हीं लोगों के बीच पूरे पचासी वर्ष तक जो लीलाएँ की थी, उनके बारे में मौन रहकर समीक्षा सुनने में ही औचित्य का अनुभव किया।

स्वयं अनेक अभावों के बीच पले-बड़े हुए थे। शराबी बाप ज्यादा पी लेने पर फाटक के आगे ही गिरा था। तेज गति में दौड़ रही `मेवाड़ की रानी’ की चपेट में आकर एकाध किलोमीटर तक घसीटती चली गई लाश को कुतूहल भरी नजरों से देख रहे दुधपीते बच्चे लीलुडा की समझ में नहीं आ रहा था कि रोज बेफहम गालियाँ बोलनेवाला बाप, उसे देखने के लिए जमा हुए लोगों के आगे खामोस क्यों हो गया था?! उसकी देह के सारे टूकडे समेटकर माँ के साथ गये परिवार के लोग उसकी पोटली उठाकर सबसे पहले तो घर ले आये। बाद में रोते हुए कहीं मोहल्ले के बाहर ले गए। बस,वह गया सो गया। उसके बाद उसका मुंह देखने को मिला नहीं था। श्रद्धांजलिसभा में मथुरादास मुखी कह रहे थे:``लीलाचंद मेरे बालसखा, लेकिन कम उम्र में ही बाप का आश्रय गँवा बैठे थे। हम सब को उस बेवा चंचीकाकी पर दया आ रही थी। मेरे बापु ने उनकी यथाशक्ति मदद की थी। लीलाचंद को बाप की कमी कभी अनुभव नहीं हो ऐसे लाड-प्यार.....’’

`-मुखी मथुरादास,चुप हो जाओ।’ लीलाचंद को उनकी सूफियाना बातें सुनकर गुस्सा आ गया।` तेरे बाप ने मेरी दुखिया माँ की लाचारी का कैसा गैरफायदा उठाया था, यह तुम्हें मालूम या मुझे? बेचारी दो हाथ जोड़े आजिजी कर रही थी:``मुखी! यह तो पाप है। मुझे मजदूरी करके रोटी कमाने दो भाई। मेरे गरीब-अनाथ बच्चे की नजरों में मुझे मत गिराओ....पर वह राक्षस उसकी गिडगिडाहट का मखौल उडाता था और गाँवभर में उसे पूछनेवाला भी कौन था? जवान विधवा से वह खिलौना समझकर खेलता रहा....’’ सयानी हुई लीलाचंद की आँखों में वह दृश्य ऐसा तो बैठ गया था कि आज अपनी शोक-संवेदना सभा में भी तादृश हो उठा। वृद्ध मथुरादास ने उस कटुस्मृति को मीठी गोली बनाकर पेश की। उस बेचारी माँ की अंतरात्मा को कैसी पीड़ा हुई होगी!-लीलाचंद कुछ सोचे उससे पहले ही गाँव के हाईस्कूल के प्रिन्सिपाल गमीं का मुखौटा चढाकर श्रद्धांजलि देने के लिए माइक के सामने खड़े हो गए।``जिस गरीब माँ का उल्लेख अभी मुखीदादा ने किया, उनका ही नामपट्ट गाँव के हाईस्कूल के बिल्डिंग पर लगा है, क्या यह कोई सामान्य घटना है? स्वर्गस्थ स्वपरिश्रम से अपने पैरों पर खड़े हुए। शुरूआती दौर में तो मिल के अदने से श्रमिक से लेकर इस स्कूल के चपरासी के रूप में अपना फर्ज अदा किया। भारी पुरुषार्थ करके उस गाँव की सेवा सहकारी मंडली के चेरमेन हुए। तालुका परिषद के प्रधान के रूप में चुने जाकर समूचे क्षेत्र की रौनक बदल दी। आखिरकार तो उन्होंने अपने लोकप्रिय नेता के रूप में दिल्लीदरबार तक अपने पांव पसारे। चपरासी से लेकर प्रधान तक के फर्ज अदा करते रहे लेकिन उनमें हमेशा आमआदमी `कोमनमेन’ ही धड़कता रहा। इस क्षेत्र के लिए उन्होंने क्या नहीं किया? जहाँ हप्ते में एकबार एस.टी.बस दिखाई देती थी वहां आज प्रति आधा घंटा अहमदाबाद जानेवाला एक्षप्रेस बस रूकता है। धुलिधूसरित रास्ते को उन्होंने राष्ट्रीय महामार्ग से जोड़कर इस क्षेत्र का रूप-नकशा ही बदल डाला है। वही मेरे गॉडफाधर हैं। प्रति रक्षाबंधन की सुबह....’’

लीलाचंद मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। बोल मास्टर! रूक क्यों गया? आंसु क्यों छलके जा रहे हैं? तुम अपनी सुंदर जोरू की बात करते हुए रूक क्यों जाते हो? रक्षाबंधन के दिन राखी बांधनेवाली तुम्हारी जोरू से कभी तुमने पूछा भी है, कि स्कूल संचालक मंडल के प्रमुख ने तुम्हें नौकरी क्यों दी थी? अरे मूर्ख! तुमसे भी ऊँचे मेरिटवाले प्रत्याशी थे-लाईन में। शिक्षाधिकारी की नामरजी के रहते भी तुम्हें ऑर्डर दिया गया था। याद है? वैसे तो रुपयों की गड्डी लेकर नौकरी खरीदने के लिए अन्य दो-तीन और भी थे, लेकिन लीलाचंदकाका तुम्हारी जोरू पर मोहित था। उसे एंटीचेंबर में बुलाकर सौदा निबटाया था। तुम्हें आज तक इस बात को लेकर अँधेरे में रखा हो–यह बात स्वीकार्य नहीं है। चेरमेन को देखते ही सुनंदा के चेहरे पर रौनक आ जाती थी, क्या ऐसे ही रौनक आ जाती थी?! आचार्य का ऑर्डर देते ही `बहन टाईपिंग जानती हैं? पूछा था। याद कर। उसे टाईप-क्लास जॉइन करने की व्यवस्था चेरमेन ने ही कर दी थी ना! अपनी कार में अपने साथ बिठाकर महेसाणा ले जाते थे और शाम को वापस लौटने पर `सहीसलामत’ सौंप देते थे। सारे प्रदेश को मालूम था कि सुनंदा `साहब’ की खास है। तुम यदि उसे भोलीभाली समझते हो, तो तुम्हारी समझ तुम्हें मुबारक! अन्यथा सुनंदा ने तुम्हारे साथ ही नहीं, मेरे साथ भी धोखा किया है। मरने के बाद तो इन्सान को सच बोलना चाहिए ना? मैंने उसे एकबार अपनी आँखों से उसे मेरे बड़े बेटे राजु के साथ रासलीला करते हुए देखा है। उसके बाद मुझे भी भर्तृहरि सा बैराग्य हो गया था। अलबत्ता,मैंने उसे कोई फटकार नहीं सुनाई थी। जो चाहे सो करे-उसका शरीर उसकी प्रोपर्टी है।-वह उसका जैसा उपयोग करना चाहे,वैसा करने का उसका जन्मसिद्ध हक़ है!’

अभी भी सुनंदा ने चित्त पर से काबू छोड़ा नहीं था कि वहां मंच पर सिसकने की आवाज सुनी। लीलाचंद चौंक ऊठे।`` मैं आज जो कुछ हूँ, वह पूज्य लीलाचंद पटेल साहब के कारण हूँ। मेरी कोई हैसियत नहीं थी, इतने बड़े जिले की जिला परिषद् की पतवार सम्हालने की। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि जीवन में कभी मुझे भी राजनीति के खेल खेलने पड़ेंगे। मैं तो सीधीसादी गृहिणी थी। अभी तो प्रसव काल से बड़ी मुश्किल से मुक्त हुई थी कि काका की कार एक दिन मेरे मोहल्ले के नुक्कड़ पर आकर रुकी। मेरे फाधर को पहचानते थे। अत: सीधे ही घर में प्रविष्ट होकर बोले: ``रामजीभाई! क्या बिटिया को प्रसूति के लिए बुलाया था?-मेरे फाधर तो बेचारे देहाती किसान,उन्हें भी आश्चर्य हुआ था। जवाब में कुछ कहे,उससे पूर्व ही काका ने ऑफर दे दिया।: प्रसूति संपन्न हो गयी हो तो मुझे उसे टिकट देना है। इस बार जिला परिषद् में प्रमुख की सीट बक्षी-अनामत है। मुझे तो घर की ही लड़की को प्रमुख बनाना पड़े ना!’’ और इस प्रकार, यह दक्षा ठाकोर....’’-दक्षा बात तो तुम्हारी एकदम सच है। दक्षा को मैं दीक्षा दिलाना चाहता था,चाहे जो भी हो लेकिन है तो मेरे ननिहाल की ठकुराईन। फिर मुझे कहाँ ज्यादा झंझट में उतरना पड़ा था।` काका की दक्षा’ जैसी पूरी किताब लिखी जा सकती है, पर मेरे पास क.मा.मुंशी जैसी कलम नहीं है ना बेटा!

जिंदगी में लीलाचंद पटेल ने कौनसे शौक पूरे नहीं किये। उमाशंकर ने जिस `प्रणयरस’ का आकंठ पान करने की तत्परता दिखाई थी, वह इस गंवई पाटीदार को बिना मेहनत किये मिलता रहा था,बल्कि पी-पीकर अघा जाने के बाद तो ऊबकाई आने लगी थी। अवस्था के कारण अंग-उपांग भी नादुरस्त हो गए थे फिरभी प्रणयरस के छलाछल प्याले तो बिन मांगे ही मिलते रहे। तब तक कि अंत में तो......

``लीलाचंद काका को आखिरी वक्त में बस, एक ही लगन सवार थी। यह मानवावतार बार बार नहीं मिलनेवाला। भौतिक संपत्ति या सत्ता से भी मोह नहीं रह गया था और आश्रम बनाकर जीवन के आखिरी बरस ईश्वर भक्ति में, परम के समीप बीताने का संकल्प दृढ से दृढ़तर होता गया। आप नहीं मानेंगे, एकबार मुझे आधीरात में नींद से जगाकर संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की थी।’’ महंत भभूतिनाथ की आँखें उमड़ आयीं।`` मैंने उनको रोका था: समाज को आपकी जरुरत ज्यादा है। आप श्वेत वस्त्रों में संत की ही भूमिका अदा कर रहे हैं.....समाजसेवा का भेख धारण करनेवाले लोकनायकों को संन्यास नहीं लेना चाहिए। मुझे अपनी बात उनको समझाने में बहुत जोर लगाना पड़ा था। यह कार्य मेरे लिए बहुत कष्टसाध्य हुआ था।’’ महंत ने अपना अवरुद्ध गला खंखारते हुए कहा:`` आनेवाली पीढ़ी ही उस महान आत्मा की सही अर्थों में कद्र करेगी। आप लिख लीजिये, उनके स्मारकों की पूजा होगी।’’महंत ने गदगद होकर अपना स्थान ग्रहण किया। लीलाचंद पटेल को आश्चर्य हो रहा था कि क्या मैं ऐसा महान था?! मुझे तो पचासी वर्ष की आयु में कभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ! मैं तो अपना कुछ अलग ही मूल्यांकन कर रहा था।-खुद को निरा भ्रष्ट,व्यभिचारी और अति हीन समझता रहा। ये सब जिस हुलास के साथ मुझे श्रद्धांजलि दे रहे हैं,ऐसी कोई योग्यता तो मुझ में थी ही नहीं!

अवश्य, यह किसी और व्यक्ति की श्रद्धांजलिसभा होनी चाहिए। लीलाचंद पटेल ने उनके सूक्ष्म देह का माथा खुजलाया।: ``कहीं मैं भूले से तो नहीं आ गया?’’-पर दूसरे ही क्षण उस मंच पर रखा आदमकद होर्डिंग नजर आया। तब विश्वास हुआ, कि यह तो मेरी ही शोक-संवेदना सभा थी, बल्कि गुणानुवाद सभा, क्योंकि यहाँ तो सारे अवगुणों पर गुणों का सुनहला वर्क चढाकर स्वयं को महामानव की पांत में बिठाने का विधिपुरस्स: षड्यंत्र चल रहा था।

अंत में, शासक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष खड़े हुए। कहने लगे,`` इस लीलाचंद काका को आप जिस रूप में जानते हैं, उससे तनिक अलग रूप में मैं जानता हूँ। गत चुनाव में हमारे प्रत्याशी की जीत में उनका महत योगदान था। अंत:समझवाले एक बुझूर्ग ने एक शर्त रखी थी: अब हमारा वक्त पूरा हो गया है। इस उमर में मैं पक्षांतर नहीं करूँगा लेकिन यदि आप मेरे बेटे को टिकट देंगे तो उसे आशीर्वाद प्रदान करने से मुझे कोई रोक नहीं सकेगा। आज हमारे क्षेत्र को गतिशील युवा नेतृत्व प्रदान करके उन्होंने बिदाई ली है। मुझे श्रद्धा है, कि उनकी आत्मा जहाँ भी होगी वहां से हम सब पर आशीर्वाद बरसा रही होगी। उन्होंने स्वयं तो सिफर से महासृजन किया ही है,साथ ही पक्षांतर किये बिना ही नयी पीढ़ी के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान कर के बीदा हुए। ऐसे दिवंगत नेता को शत शत प्रणाम....’’

लीलाचंद पटेल के नाम के अमर रहो के नारे गूंजने शुरू हो गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि हंसें या रोयें! यकायक सभा मंडप में आंधी का तेज झोंका आया। मंच पर रखा हुआ दिवंगत नेता का होर्डिंग औंधा गिरा। सभा में भगदड़ मच गई। लीलाचंद से रहा नहीं गया:``अरे ओ! कोई उस होर्डिंग को तो ....’’ पर उनकी आवाज पृथ्वीलोक के वातावरण को भेदकर उन लोगों तक थोड़े ही पहुँचनेवाली थी?


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