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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



उसने कहा था

सुदर्शन कुमार सोनी


   वे शहर के एक सम्माननीय , स्थापित व वरिष्ठ साहित्यकार है , एैसा हम नही वे अपने को मानते है ! साहित्यिक गोष्ठियों व समारोहो मे बिना नागा षिरकत करते है। वहां रचना पाठ भी करते है , लेकिन इनकी खासियत है कि ये अल्प लेखन करते है और रचना पाठ भी जाहिर है कि अपनी अल्प लिखित रचनाओ का ही इन्हे मजबूरन करना पड़ता है। इनका सोचना है कि कम लिखो लेकिन अच्छा लिखो बल्कि इतना अल्प लिखो कि इतिहास मे अमर हो जायें ! इसलिये उन्होने कुल तीन कहानी और तीन ही कवितायें लिखी है ! और इन्ही का पाठन वे हर कार्यक्रम मे चका्रनुकम से करते रहते हैं। उनकी मुद्रा हमेषा षांत व धीर गंभीर रहती है। नियमित और अधिक लिखने वाले साहित्यकारों को वे अजीब नजरों से देखते है ! इस समय कभी तो उनके प्रति दीनता तो कभी यह भाव की ठीक है खूब लिख कर अपनी भद करवाने दो , यदि अल्प लिखा तो फिर उनका प्रतिद्वंद्वी नही हो जायेगा ? इस सदी मे अब केवल और केवल उन्ही का स्थान गुलेरी जी के समान सुनिश्चित है !

  वे विगत दिवस एक साहित्यिक समारोह मे खाकसार से टकरा गये । उन्होने फरमाया कि क्या कंही गुलेरी जी की जीवन गाथा मिलेगी ? मैने कहा कि एैसा कंही देखने मे तो नही आया ? वे बोले कि गूगल पर भी बहुत सर्च किया लेकिन कुछ खास सामग्री नही मिल रही है ?

  मैने लेकिन उत्सुकता मे पूछा कि गुलेरी जी की जीवनगाथा की अचानक क्या जरूरत आन पडी ़?

  तो वे गंभीर हो गये , बोले कि आखिर पता तो चलें कि इस आदमी मे क्या खास बात थी कि इसने इत्ता कम लिखा कुल जमा तीन कहानियां और साहित्य मे अमर हो गया ? उनकी गंभीर मुदा परम गंभीर मुदा्र मे तुरंत ही परिवर्तित हो गयी थी। , किंचित उनके मन मे अपनी भी तीन कृतियों के आंकडे़ का ध्यान आ गया होगा।

  मैने कहा , हां इतना तो मंजे हुये कथाकार अमरकांत का भी नाम नही हुआ है जितना इनका हुआ ? और यह भी एक मात्र कहानी ’उसने कहा था’ के दम पर ही हुआ ?

  वे परम गंभीरता काफी देर तक ओढे़ रहे। मैने पूंछा कि आजकल क्या लिख रहे हैं तो वे और गंभीर हो गये कुछ बोले नही ! मैने और जोर दिया कि बंधु क्या बात है कि कुछ बोल फूट नही रहे है ?

  वे बोले कि यार ज्यादा लिखा नही जाता बस यही तीन कहानी व तीन कविताये है ! इनको ही लिखने मे अपने को तेरह साल लग गये ! मै सोचने लगा कि हर माह एक शब्द लिखा होगा तब इतनी नायाब तीन रचनाये तैयार हुयी होंगी ? इत्ता सा बोल वे फिर परम मौन की अवस्था मे जाते लगे।

  लेकिन दूसरे ही पल फिर गुलेरी जी पर आ गये । बोले कि यार उसकी कहानी ’उसने कहा था’ वाकई बेजोड़ थी । मैने कहां हां और आपकी कहानी ’नदी जोड’़ भी कोई कम नही है । यह सुन उनके कान तुरंत वैसे ही खडे़ हो गये जैसे किसी ष्ष्वान के हड्डी देख कर हो जाते है ! बोले कौन कह रहा था ?

  मैने उनकी कमजोरी ताड़ ली । मैने कहा कि अभी पिछले सप्ताह जो संगोष्ठी हिन्दी भवन मे हुयी थी उसमे ’नदी जोड़’ कहानी का जिक्र समीक्षको ने किया था । उनका कहना था कि यह बेजोड़ कथा है प्रकृति से मनुष्य के बढ़ते अलगाव को रेखांकित करती हैं यह व्याख्या सुन उनके कान और कड़क हो गये ! वे चिंतन की मुदा्र मे आ गये। मैने कहा कि अब कुछ नया लिखें लेकिन वे तो मन बना चुके थे कि अब तो और नही ही लिखना। जब नदी जोड़ मे ही इतनी संभावना है कि वह कभी ’उसने कहा था’ कि बराबरी कर लें तो फिर काहे को मगजमारी की जाये । इसके अलावा उनकी यह मानता कि महान साहित्यकार कम ही लिखते है लेकिन जो लिखते हैं वह कालजयी हो जाता है।

  बहरहाल वे मुझे शहर के कई साहित्यिक कायक्रमो व गोष्ठियों मे बराबर मिलते रहते है लेकिन पढ़ते वही रचनायें बार बार है उनके पास कुल जमा तीन और तीन की साहित्यिक पूंजी है । उन्होने कसम खा रखी है कि अब कुछ और नही लिखुंगा और वैसे भी कौन सा लिखने से कोई प्रसिद्व होता है ? खासकर ज्यादा लिखने से , कई लोगों ने पचास सौ किताबे रच डाली लेकिन उन्हे कोई जानता नही ? जब इस दुनिया से उठते है तब समाचार आता है कि महान साहित्यकार थे , इतनी किताबे अपने पीछे लिखी छोड़ गये है ! और किसी किताब को कोई जानता हो या न यह जरूर लिख दिया जाता है कि इनकी फलां किताब से वे चर्चा मे आये थे !

  उनका और न लिखने का निष्चय तो दिन प्रतिदिन और मजबूत होता जा रहा है और जो उन्होने लिखा है वह एक दिन इतिहास को कालजयी कहना पडे़गा और उन्हे चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी की पंक्ति मे साहित्य समाज को खडा़ करना ही होगा।

  हमारी भी हमारे शहर के गुलेरी जी द्वितीय को शुभकामनायें ।

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