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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



भारतेन्दु हरिशचन्द्र – समसामयिक नाटककार
(“अंधेर नगरी” के परिप्रेक्ष में)


डा. रानू मुखर्जी


   भारतेन्दुजी का समय भारत में अंग्रेजी शासन का, पश्चिमी सभ्यता संस्क्रुति के प्रभाव का, भारतियो की दासता का समय था. अएसे समय मे उन्होने हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषा को केवल हिन्दी साहित्य के लिए नहि लिया, बल्कि एक सम्पुर्ण आन्दोलन के लिए, नव जागरण के लिए लिया. उन्होने पत्रकारीता भी की, लेकिन उनके लिए साहित्य, पत्रकारीता और राष्ट्रजागरण तीन भिन्न चिजे नही थी. उनका निजी व्यक्तित्व देश-समाज, हिन्दी साहित्य की आवश्यक्ताओं और चिन्ताओं से आरम्भ से हि जुझ रहा था. यह उनका व्यापक, उन्मुक्त सृजनशील व्यक्तित्व था कि वह अंग्रेजों के गुणो, अच्छी शिक्षा को सीखने के लिए भारतियो को ललकार देते थे और अंग्रेजो की स्वार्थपरता, क्रुरता पर, राजनीति पर और षडयंत्र पर प्रहार भी कर लेते थे.

   भारतेन्दुजी अपने ही युग के निर्माता नही थे, समकालीन साहित्य के लिए भी एक अप्रतिम उदाहरण और आदर्श है. देश काल की सीमा से परे उनका साहित्य, सचमुच साहित्य, के द्वारा मनुष्य को जानते, देश के चरित्र और संस्क्रुति की पहचान करने – कराने का माध्यम हे. आलोचकोने अगर कबीर को पहला युगप्रवर्तक कहा हे तो उन्हे दुसरा, क्योकि दोनो मे ही अपने को मिटानेकी भावना, क्रान्ति की चेतना और अपने ही वर्ग और वतावरण को, विदेशी सत्ता को भी और उसके साथ साथ स्वयं अपने देशवासियों की मानसीकता को बेबाक ढंग से कह देने की जिन्दादिली और निर्भीकता थी.

   इस प्रकार से भरतेन्दुजी के लिए साहित्य सौद्यश्य था और एक पुरा आन्दोलन था स्वाधीनता आन्दोलन, भाषा आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, साहित्यिक आन्दोलन, सामाजिक आन्दोलन, धार्मिक आन्दोलन, रंगमंच आन्दोलन.

   इसलिए बालमुकुन्द गुप्त जी ने उनके लेखन को तेज, तीखा बेधडक लेखन कहा और समीक्षक डो. रामविलास शर्मा जी ने उन्हे हिन्दी नवजागरण और प्रगतिशील चेतना से जोडा हे. वस्तुतः भरतेन्दु ने एक और छुआछुत, विधवा-विवाह, अनमेल विवाह, नारी व्यक्तित्व आदी विषयों पर खुलकर लिखा, बल्कि प्रेमचन्द्र और निराला की भाती पुरानी घिसी-पिटी मान्यताओ को सडीगली धारणाओ को और पिछडेपन को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना सिखाया. जनता के सुखदुःख, उनकी निरक्षरता, निर्धनता और उनके मनोरंजन सभी तत्वो के प्रति वो सजग थे और जनसाधारण मे अति लोकपप्रिय थे. वह जनता के हितैषी थे और उनके लेखक अभिनेता रुप को जनता पहचानती थी. साहित्य और जनता का यह निकट का संबध समकालीन साहित्य को एक दिशा दिखाता हे.

   भरतेन्दु जी ने हिन्दी की कई विधाओ मे से आलोचना कि भी नींव डाली. उनका नीबंध “नाटक” एक प्रकार से नाट्यक्षेत्र में हिन्दी-आलोचना का महत्वपुर्ण दस्तावेज कहा जा सक्ता हे. इस रचना मे लेखक ने अपने अध्ययन, अनुभव, चिन्तन और अपनी उन्मुक्त विचारधारा को व्यक्त किया हे. नाट्यरचना के संदर्भ में उनका कहना है, “मनुष्य की परिवर्तनशील वृत्तियों का ध्यान रखकर नांटक लिखे”.

   अपनी बहुमुखी व्यक्तित्व के साथ भरतेन्दुजी ने नाट्यरचना के क्षेत्र में अपनी अद्भुत सृजननशीलता का परिचय दिया, नाटक उनकी प्रमुख बिधा लगती थी केवल इसलिए नहीं की वे एक अभिनेता एवं निर्देशक थे बल्कि इसलिए भी कि क्रान्ति और नवजागरण, संस्कार और सोधन की दृष्टि से जनता के लिए वह नाटक को सबसे सशक्त नाध्यम समझते थे. दृश्यकाव्य और साक्षात्कार होने के कारण उसकी प्रभावशीलता बढ जाती हे. उन्होने प्रचुर नाट्य साहित्य की रचना की जो मौलीक भी हे और अनुदीत भी, सामाजीक, एतिहासिक, पौराणिक विविध विषयों को लेकर उन्होने अपनी आधुनीकदृष्टि को ही व्यक्त किया हे.

  उनकी नाट्य रचनायें:-

   वैदिकी हिंसा – हिंसा न भक्ति, प्रेमजोगिनी, विषम्य विषमौषधम, चन्द्रावली, भारत-दुदर्शा, नीलदेवी, अंधेर-नगरी, सती-प्रताप, विद्यासुन्दर (बांग्ला से रुपंतरित), सत्य हरिश्चन्द्र (संस्कृत से रुपंतरित) इसके साथ ही अनूदीत नाटकों की भी एक लंबी श्रृंखला है.

   भारतेन्दुजी ने बडी तीव्रता के साथ नाट्य की कलागत विशेषताओं को पुरी तरह समझा ही नहीं, उसके लिए सामुहिक और योजनाबद्ध ढंग से एक संपुर्ण आन्दोलन की तरह काम किया. मंडली की स्थापना करके अभिनेता और निर्देशक के रुप में उनकी सक्रियता इसे प्रमाण करती हे, भारतेन्दुजी अपने युग- भारतीय और आधुनिक-दोनों संदर्भो में नाटक और रंगमंच की प्रकृति, नाट्य भाषा, लोक जीवन और लोकगीतों की सरसता के प्रति जागरुत थे हिन्दी के अपने नाट्यशास्त्र, नाट्य समीक्षक के मानदंडो के प्रति वह सतर्क थे. उनके सामने बहुत से प्रश्न एक साथ थे- नाट्यलेखन, अनुवाद, प्रदर्शन, राष्ट्रिय चेतना का विकास, लोक रुची का परिष्कार फारसी थियेटर के विरुद्ध लडाई. वह निरंतर थियेटराना जगत से अलग नई नाट्य-परंपरा, भिन्न नाट्यशिल्प और हिन्दी रंगमंच की स्वतंत्र विकास परंपरा के प्रति संघर्षशील रहे. जनजीवन मे गहरी पैंठ, सतर्क दृष्टि और संवेदनशीलता ने भारतेन्दु के नाटकों मे ऐसी नाट्यभाषा और तिलमिला देनेवाले व्यग्य को जन्म दिया जो लोकमानस से टकराने की शक्ति रखती थी. भारतेन्दुजी के पास विलक्षण रंग व्यक्तित्व, अद्भुत संवेदनशीलता और संगठनशक्ति थी. संकेतिकता, प्रतीक, लोकतत्व, संगीत, लय, व्यग्य-आज के नाटक के सारे पक्ष उनके नाटक में मौजूद हें.

   अपने युग में भी नाट्यविधा की द्रश्यात्मक्ता और उसकी रंगमंचियता को जितनी दृढता के साथ भारतेन्दुजी ने पहचाना और उसे उदाहरण रुप में प्रस्तुत किया वैसा शायद ही किसी अन्य नाटककार ने किया है. वह मानते थे कि “कला वास्तविक उन्नती का आधार है.” लेकिन इससे भी चिंतित थे कि हिन्दी का कोई रंगमंच नहीं है. रंगकर्मा, अभिनेता, निर्देशक, अनुवादक, नाट्य समीक्षक के रुप में उन्होने अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ संगठित कार्य आरम्भ किया. उनके अभिनय रुप से उनके व्यक्तित्व की नाटकियता से जनसमूह परिचित था.

   “जानकी मंगल” नाटक में १८६८ ई. में बनारस मे अभिनय किया और वहा के थियेटर में लक्ष्मण की भुमिका अभिनीत करके अभिनय प्रतिमा का प्रदर्शन किया. “नीलदेवी” नाटक में उन्होने पागल की चुनौतीपुर्ण भुमिका की थी. “सत्यहरिश्चन्द्र” नाटक मे हरिश्चन्द्र के रुप में स्वयं उनको देखकर जनता गदगद हो उठी थी वे प्रायः “स्वांग” भी किया करते थे.

   नाटक के उद्देश्य की चर्चा करते हुए उन्होने पांच उद्देश्य बताए है – (१) हास्य, (२) श्रृंगार, (३) कौतुक, (४) समाज संस्कार और (५) देशवत्सलता उस युग के बालकृष्ण भट्ट का भी विश्वास था कि नाटक मे केवल क्षणीक मनोरंजन ही नहीं देनोन्नति का भी कुछ उपदेश होना चाहिये. सामाजिक सुधार के साथ साथ किशोरीलाल गोस्वामी, अम्बिकादत्त ब्यास, काशिनाथ खत्री ने भी मनोरंजन और उपदेश दोनो पक्षो को महत्व दिया. भारतेन्दुजी के “सत्य हरिश्चंद्र” नाटक मे सत्यवादिता, कर्तव्यपरायणता, चारित्रिक द्रढता जेसे मुल्यो के साथ साथ युवा वर्ग के लिये उपयोगी आदर्श भी थे. “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवती”में सामाजिक, धार्मिक विकृतियों पर क्रूर व्यंग्य है,” विषम्य विषमौसधम” में अंग्रेजों की चतुर शोशण प्रणाली और भारतियो की मोहाशक स्थिति का चित्रण है. “कोउ त्रिप होउ हमे का होनी” “नीलदेवी” में जहा राजपुतानी आन बान हे वहीं नारी व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा भी है. “भारत दुर्दशा” और “भारत-जननी” नाटक नवजागरण सजगता समसामयिक परिस्थितियों का चित्रण और विदेशी शासन की दासता के चुंगल में फसे भारतीयता और राष्ट्रियता की भवना को जगाने वाले नाटक है. “प्रेमजोगिनी” में काशी के धर्माड्म्बर का चित्र है तो “चन्द्रवली” उनकी वैष्णव भक्ति और प्रेम तत्व की प्रतीक है. “मुद्राराक्षस” का अनुवाद इसलिये किया क्योंकि इसमे चाणाक्य जैसा एक ऐसा पात्र है जो कि झुठी नैतिकता को नहीं दोहराता है मनुष्यता को ही आधार बनाता है. “विषस्य विषषममौषधम” केवल मात्र- एक पात्रीय नाटक है लेकिन उसमे भावों, के स्वर के इतने उतार-चढाव हैं, मुहवरे, किस्सागोई, चुटकुले, संस्कृत- उर्दू के रोचक प्रयोग, दोहे चोपाई की आर्कषके व्यंजना और अभिनय की लयात्मकता, रवानी इतनी अधिक है कि एक पात्रीय नाटक भी दर्शकगण को चमत्कृत कर देता है. “हला कहाँ हिन्दुस्तानी सिफारिशी दरबार, कहाँ हमसे पंडित. “हमहुं कहब अब ठकुर सुहाती” “हमें तो गद्दी से काम है-कोई त्रिप होउ हमैं का हानी” जैसे बंधडक, सांकेतिक खरी आलोचना से भरे रोंचक प्रसंगो से नाटक भरा पडा है. “अंधेर नगरी” इसी प्रकार के जीवंत रचना कौशल का प्रमाण है.

   कुछ रचनाएसमय क साथ साथ कभी पुरानी नही होती है. अपितु बदलते परिवेश बदलती परिस्थितियोंमें नए-नए अर्थो में प्रतिबिम्बत होती है. “अंधेर नगरी” नाटक हर काल, हर स्थान से जुडता है और जुडकर अपना नया सौदर्य प्रदर्शित करता है. कहेने को तो “अंधेर नगरी” एक प्रहसन है लेकिन इसमे समसामयिकता और आधुनिक रंग चेतना का इतना गहरा समावेश है कि इसने विख्यात नाटकों में अपना स्थान बना लिया है.

   १८८१ ई. में लिखा गया यह नाटक किसी जमींदार को आधार बनाकर नेशनल थियेटर के एक ही बैठक में लिखा गया था. एक ही रात मे भरतेन्दुजी ने एक लोकोक्ति “अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा” को इतना व्याग्यात्मक, सार्वजनीन, सार्वलोकिक और सöजनात्मक अर्थ दे दिया. आरंभ मे इसकी प्रस्तुती को भले ही प्रहसन के रुप में लिया गया हे परंतु बाद की प्रस्तुतियाँ में आधुनिक रंगकर्मियों नें इसे अपने देश की बदलती परिस्थितियों, क्रियाओं, चरित्रों, मूल्यहिनता और खोखले पन को देखना शुरु किया और तब इस नाटक की महत्ता और अधिक बढ गई.

   “अंधेर नगरी” का कथानक बहुत बडा या गम्भीर नहीं है जो है वो एक दृष्टान्त की तरह सामने आया है. महन्त अपने दो शिष्यों – गोवर्धन और नारायणदास – के साथ भजन गाते उए प्रवेश करते है और लोभी वöत्ति से बेच रहने का उपदेश देकर बडे दिखनेवाले सुन्दर नगर में भिक्षा लेने भेजतें है. इसके बाद ही अगला दृश्य बाजार का आता है. जहाँ हर दुकानदार अपने अपने सामान की आवाज लगाता सामान बेच रहा हे. यह द्रश्य ही इस नाटक का प्राण है, क्योंकि यहा पुरा विश्व है, पूरा देश है, पूरा इतिहास है, अंग्रेजी और भारतिय तो हैही. इस बाजार के मोह जाल में जब गोवर्धन प्रवेश करता है तो हर चिज टके सेर दिखती है. उसे लगता है “बडा आनंद है, हर चीज टके सेर है.” और भरपुर मिठाई खाता है. और गाता नाचता जंगल पहुचता है. मंहतजी उसे समझातें है कि “ऐसि नगरी में रहना उचित नहिं”. पर वह लोभवश वहिं रहेना चाहता है. चौथा द्रश्य राजा मंत्री और उसके दरबार का है जहां राजा का मदिरा-पान, मूर्खता, मंत्री की चमचागीरी, नौकरों का सेवाभाव, फरियादी का आकर अपनी फरियाद सुनाना और फिर राजा द्वारा एक एक अपराधि को दरबार मे बुलाकर मुर्खता भरे प्रश्न करना और कोतवाल को फांसी की सजा देकर दरबार बरखास्त करने का चित्रण है. सब चले जाते है फरियादी कि फरियाद वही की वही रह जाती है कि मेरी बकरी दिवार के निचे दबकर मर गई. पांचवा दृश्य जंगल मे गाते आते गोवर्धनदास का है जो लोभवश मोटा हो गया है. इतने मे फांसी के फंदे के आकार के अनुसार किसी मोटे आदमी को तलाश के आदेश मे राजा के सिपाही उसे जबरदस्ती पकडकर ले जाते है. वो रोता चिल्लाता और गुरुजी के आदेश को न मानते पर पश्चताप करता रहे जाता है. अंतिम दृश्य शमशान का है जहा फांसी पर चढाये जाने की तैयारी है लेकिन महंतजी की इस उक्ति से कि “इस समय ऐसा सारत है कि जो मरेगा सीधा बैकुंठ जाएगा.” सबमें प्रतियोगिता सी होने लगती है कि हम फांसी चढेगें. अंततः राजा स्वयं अपने को फांसी पर चढाये जाने का आदेश देता है और महंत कहतें है.

“जहाँ न धर्म न बुधीनाही, नीति ना सुजान समाज.
ते ऐसहिं आपुहिं नसे, जैसे चोपट राज”.



   यह उपर से हास्य प्रधान दिखनेवाला नाटक वस्तुतः तीखी व्यंग्यपूर्ण रचना है. मुख्य बात तो यह है कि भारतेन्दुजी का व्यग्य बहुत कटु, और उतना प्रत्यक्ष नहीं है, जो हंसता है वह तिलमिलाता है. इस नाटक में सामंती व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था की भ्रष्टाचारिता, सत्ता के विवेकहीनता, शिथिलता जडता, सत्ताधारी मानसिकता, उसकी निरंकुशता, निरीह जनता को लम्बे समय तक उलझाते और ठगने की प्रवृत्ति आज के युग में मूल्यों की विकृति और विसंगति को चित्रित किया गया है. इसके केन्द्र बिन्दु लोभवृत्ति और चौपट राजा की परिणति. लेकिन नाटक का मुल स्वर प्रचलित अराजक, मूल्यहीन अमानवीप व्यवस्था प्रणाली का है जिसमें अन्याय है, झुठ है, लोभ स्वार्थ, शोषण जैसी प्रबित्तिया पनप रही है और प्रवाहमान है. “अंधेर नगरी” अन्ध व्यवस्था का प्रतीक है. चौपटराजा विवेकहीनता और न्यायदृष्टि के न होने का प्रतिक है. उनके न्याय पर अन्धता का प्रभाव है. अविवेकी प्रमादी राजा के मूल्यहिनता को तो भारतेन्दुजी ने दिखाई ही है साथ ही उन्होने गोवर्धन के द्वारा मनुष्यके लोभ वृत्ति पर भी व्यग्य किया है. “अंधेर नगरी” व्यग्य ही है पर यह अंधेर नगरी विश्व के किसी भी कोने में हो सकती है क्योंकि ये प्रवृतियाँ आधुनिक युग की देन है.

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