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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



"हिन्दी कविता को कविवर गोपाल सिंह नेपाली का अवदान :"

डॉ० छेदी साह


   देश और समाज के समर्पित प्रहरी और ज्योतिवाही कवियों में श्री मैथिलीशरण गुप्त, श्री माखनलाल चतुर्वेदी,श्री सोहनलाल द्वेदी तथा श्री गोपाल सिंह नेपाली का नाम ससम्मान लिया जा सकता है | कविवर नेपाली जी उत्तर छायावाद के लोकप्रिय कवि गीतकार थे | हिंदी कविता के क्षेत्र में ये छायावाद और प्रगतिवाद की संधि रेखा पर खड़े युग कवि हैं |

   कविवर गोपाल सिंह नेपाली का आविर्भाव ११ अगस्त १९११ ई. को बिहार प्रान्त के बेतिया, जिला पश्चिमी चम्पारण में हुआ | ये अदभुत मेधा के व्यक्ति थे, इनकी काव्य-प्रतिभा से सभी लोग प्रभावित थे| किशोरावस्था से ही इनमें काव्य रचना के अंकुर प्रस्फुटित होने लगे | इन्होने हिन्दी साहित्य जगत की निस्पृह सेवा की | इनकी कल्पना शक्ति विलक्षण थी | ये उत्तम संस्कारों से युक्त स्वाभिमानी रचनाकार और पत्रकार थे| इन्होंने आत्म परिचय देते हुए लिखा है

“ तुझसा लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्ता गह लेता |
ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों मैं रह लेता || “



   कविवर नेपाली का भागलपुर क्षेत्र से निकट का सम्पर्क रहा है | कवी सम्मेलन और काव्य गोष्ठियों के सुअवसर पर वे निरंतर भागलपुर के आस-पास आते रहते थे| इनके गीतों का स्वर सुनकर जनता भाव-विभोर हो जाती थी | इनकी कविता सुनकर कर सह्रदय जन आनन्द से अभिभूत हो उठते थे | अपने सुन्दर गीतों और सुमधुर कविता पाठ के कारण ये अत्यंत लोकप्रिय कवि गीतकार हो गये | अत: इनसे तत्कालीन कवि स्पर्धा की भावना रखते थे |

   इनकी आरंभिक कविताओं पर छायावाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है | पर उत्तरोत्तर इनकी कविता का एक स्वतंत्र मार्ग निमिर्त हो गया | हिन्दी चित्रपट संसार में इन्होंने सुकृतियों द्वारा अपनी काव्य प्रतिभा को जीवित रखा | निम्नलिखित काव्य के रूप में इनका लेखन हिन्दी संसार को समर्पित हुआ – उमंग , रागिनी , पंछी , नीलिमा , पंचमी नवीन और हिमालय ने पुकारा आदि | इनकी अप्रकाशित रचनाएँ भी हैं | समीक्षकों ने नेपाली को गीतों का राजकुमार कहा है| इस महान रचनाकार का निधन 17 अप्रैल 1963 ई. को भागलपुर के रेलवे प्लेटफोर्म नं- 2 पर हुआ |

   इनकी रचनाओं में सामान्य जनता की पीड़ा व्यंजित हुई है | स्वतंत्रता , समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रहरी के रूप में इन्होंने अपने साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया | महाकवि नेपाली ने प्रकृति के भीतर की मधुर ध्वनियों और चित्र की ध्वनि एवंम रेखाओं को समेटकर कुछ कोमल एवं मधुर गीतों की रचना की | इनके गीतों में आत्मा की उड़ान कम और प्रकृति के सुन्दर चित्रों की योजना अधिक हैं | इनके स्वरों की पायल कम नहीं होती और भावों का स्वास कम नहीं होता | समिक्षकों की अपेक्षा के बावजूद कविवर नेपाली सह्र्दय जनता की याद में सदा बने रहेंगे |

   कविवर नेपाली को अपने देश तथा अपनी भाषा के प्रति अनन्य अनुराग था | उनका प्रकृति प्रेम , हिन्दी प्रेम और देश प्रेम वन्दनीय और सराहनीय है | उन्होंने एक राष्ट्र, एक देश और एक राष्ट्रभाषा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- एक देश,एक राष्ट्र एक राष्ट्रभाषा / एकता स्वंत्रता देश की ज्वलंत आशा / कोटि-कोटि व्यक्ति यहाँ / संघ यहाँ / शक्ति यहाँ जाति धर्म भेद न कर/ एक राष्ट्रभक्ति यहाँ / एक ही क्षुदा समग्र / एक ही पिपासा / एक देश /एक राष्ट्र / एक राष्ट्रभाषा /

   “हिन्दी है भारत की बोली” शीर्षक कविता में उन्होंने हिन्दी की महिमा को रेखांकित किया है| हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उनके भावोद्गार अवलोक्य है:

“ दो वर्तमान का सत्य सरल
सुन्दर भविष्य के सपने दो
हिन्दी है भारत की बोली तो
अपने आप पनपने दो |”



   कविवर नेपाली की काव्यधारा ने प्रगतिशीलता परम्परा को स्वर प्रदान किया/जन कवि नेपाली के स्वरों की साधना सराहनीय है |उनकी मानवतावादी भावना अनुपम और अभिनन्दनीय है | उनके नवीन संग्रह में युग- स्वर मुखर हुआ है |

   होंगे भस्म अग्नि में जलकर / धरम करम और पोथी पतरा/और पुतेगा व्यक्तिवाद का चिकने चेहरे का अलकतरा /सड़ी गली प्राचीन रुढ़ि के भवन ढ्हेंगे युग प्रवाह पर कटे वृक्ष से, दुनिया भर के ढोंग बहेंगे/पतित दलित मस्तक ऊँचा कर/संघर्षों की कथा कहेंगे|| और मनुज के लिए मनुज के द्वार खुले खुले रहेंगे |

   नेपाली की कविता में देश की दुर्दशा और विपत्रता का यथार्थपरक वर्णन हुआ है | निराशा के अंधकार में भटकती हुई मानवता का मर्मस्पर्शी चित्रांकन नेपाली की कविताओं में प्राप्त होता है |

   छायावाद के रहस्यपूरित सौंदर्य और मानवीय सतह से संबंध रखने वाले नेपाली एक समादृत पत्रकार और कुशल कवि थे | तारुण्य तरंगों की मौज और कल्पना के स्वतंत्र पंछी के साथ 1934 में इन्होने अपनी कविताओं का संकलन युग के सामने रखा | प्रेम और रहस्य की मधुर गूंज वाली रागिनी सन॒ 1935 में छपी | प्राकृतिक सतरंगे उत्तरीय को मानस क्षितिज पर फैलाकर नीलिमा के सौन्दर्य चित्र उपस्थित हुए , और स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय भावना की तरंगे सन 1942 में प्रकाशित “पंचमी” में उच्छलित होती है | “विशाल भारत” शीर्षक में उनकी संवेदनशीलता की श्रोतस्विनी का उद्गम राष्ट्रीय चेतना के गोमुख से हुआ है | उनके मान में देश के प्रति उत्कृष्ट देशभक्ति की भावना जाग्रत हुई |इनकी कविता में मातृभूमि की सांस्कृतिक और सुरुचिपूर्ण वेदना है – जहाँ कोटि जन जिनका जीवन, जिनका यौवन, जिनका धन-मन सब न्यौछावर स्वतंत्रता पर/बैठे घर पर दीये जलाकर/ वंदना करते है वृद्ध बाल| भारत अखंड/ भारत विशाल |   

तू चिंगारी बनाकर उड़ री,/जाग-जाग में ज्वाला बनूँ,/ आज बसन्ती चोला तेरा,/ मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,/
तू भगिनी बन क्रांति कराली,/मैं भाई विकराल बनूँ |



   पुनः कविवर नेपाली देश के युवाओं को अकर्मण्यता की जंजीर तोड़ने के लिए चुनौती देते है |

यह अपराध कलंक सुशीले,/ सारे फूल जला देने/जननी की जंजीर बज रही/चल तबियत बहला लेना |



   व्यापक दृष्टि से कवियों ने परिवर्तित परिवेश में युग और देश का स्वरूप देखा, अपनी वाणी द्वारा उसे व्यापक संवेदना प्रदान की तथा घिरते हुए अंधकार को दूर करने हेतु आस्था का दीप जलाकर, विद्रोह का आलोक फैलाया |

   कविवर नेपाली द्वारा प्रणीत ‘नवीन’ काव्य-संग्रह में स्वतंत्रता का दीपक एक अनुपम रचना हैं | कवि संकट की घड़ी में भी आस्था का दीपक निरंतर जलाना चाहता है | कवि का दीपक साधना के पथ पर अविराम जल रहा है| कवितांश अवलोक्य है –

घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,/आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं / यह निशीथ का ला रहा विहान है|



   अतः: कवि नेपाली की कविताओं में प्रगतिशीलता का उत्प्रेरक,उद्गान है | इनकी कविताएँ इनके गीत जीवन काल में बहुश्रुत,बहुप्रशंसित,बहुचर्चित हुए |हिन्दी साहित्य के इतिहास में जो राष्ट्रीय भावना प्राप्त होती है,उसमे विविधता है |भारत के राजनैतिक जीवन में जो परिवर्तन हुए है उन्होंने साहित्य की गतिविधि को पर्याप्त प्रभावित किया है |सन् १८५७ ई० की क्रांति के अनन्तर देशभक्ति का स्वर तीव्र हुआ |देश के सभी विवेकशील,चिंतको,कवियों एवं साहित्यकारों ने एक स्वर से विदेशियों का विरोध किया |यही राष्ट्रीय काव्य धारा बहती हुई नेपाली के काव्य तट से टकराती है | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन्१९६२ में भारत पर चीन का आक्रमण होता है |देशभक्ति का यह उद्वेग ही नेपाली के लेखन में राष्ट्रीय चेतना के रूप में व्यक्त हुआ है:

   चालीस करोड़ो को हिमालय ने पुकारा / शंकर की पुरी चीन में सेना को उतारा / चालीस करोड़ो को हिमालय ने पुकारा/ हो जाए न पराधीन नदी गंगा की धारा / गंगा के किनारे को हिमालय ने पुकारा/ इस प्रकार नेपाली की कविताओं प्रकृति , प्रगति और राष्ट्रीय चेतना की सफल अभिव्यक्ति हुई है |

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