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वर्ष: 1, अंक16, जुलाई(प्रथम), 2017



अंतर्मन

आशीष त्रिवेदी


   नए साल की पहली सुबह थी. बर्फानी हवा तीर की तरह चुभ रही थी. दस बज चुके थे पर सूर्यदेव अब तक उदित नहीं हुए थे. अनु साल के पहले दिन ईश्वर का आशीर्वाद लेने मंदिर जा रही थी. उसने पूजा की थाली तैयार की और कमरे में पढ़ती ननद से झांक कर कहा

  "नीलम प्लीज मोनू का ख़याल रखना. मोनू सो रहा है. मैं मंदिर जा रही हूँ."

  बाहर निकलते ही शीत लहर ने उसे कंपा दिया. ठिठुरते हुए उसने मंदिर वाले पथ पर पग धरे ही थे कि उसके पैर जैसे जकड़ गए. एक कार अचानक सड़क के किनारे आकर रुकी. दरवाज़ा खुला और किसी ने कार से बाहर कुछ फेंका. कार तेज़ी से चली गई. अनु कोतुहलवश देखने के लिए आगे बढ़ी कि क्या फेंका गया है. सड़क किनारे झाड़ियों में कुछ पड़ा दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो उसका जी मिचला गया. वह एक भ्रूण था. उसे उबकाई आने लगी. तेजं कदमों से वह मंदिर की तरफ भागी.

  वह मंदिर की सीढ़ियों पर ही बैठ गई. इतनी सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं. मन ही मन वह भगवान से शिकायत करने लगी 'कैसी निर्दयी दुनिया है यह. तुम कुछ करते क्यों नही.' उसके मन से आवाज़ आई 'तुमने कुछ क्यों नही किया.'

  उसने फौरन उत्तर दिया 'मैं क्या कर सकती हूँ.'

  उसके अंतर्मन से फिर आवाज़ आई 'सोंच कर देखो.'

  वह सोचने लगी. उस कार की छवि उसकी आंखों के सामने तैरने लगी. काले रंग की बी एम डब्लू. उसके आखिरी के नंबर भी उसे याद आ गए. अनु ने अपना मोबाइल निकाला और १०० नंबर डायल कर पुलिस को सूचना दे दी.

  मौके पर पहुँच कर उसने पुलिस को बयान दिया. अपना कर्तव्य निभा लेने के बाद वह अच्छा महसूस कर रही थी.

  सही राह सुझाने के लिए उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया.

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